ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह देश में शासन करना चाहती है मोदी सरकार : स्वामीनाथ जयसवाल
नई दिल्ली भारतीय राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामीनाथ जायसवाल ने कहा जब कोरोना महामारी से पूरा देश जूझ रहा था तब मोदी सरकार लगातार श्रम कानूनों पर हमले कर रही थी और मजदूरों के रहे-माते अधिकारों को पूरी तरह खत्म कर दिया। कोरोना महामारी के कारण पहले से हो डगमगा रही वैधिक अर्थव्यवस्था जिस गहरी मन्दी में अंसने की ओर जा रही है उसमें पूंजीपति वर्ग का मुनाफ़ ना मारा जाये इसके लिए ही यह कदम उठाया गया है इसमें कोई भी दो राय नहीं है।
इससे यह तो सिन्द तो हो जाता है कि मोदी सरकार पूरी नंगई के साथ अपनी मजदूर विरोधी और पूंजोपरस्त नौतियों को लागू करने में लगी हुई है स्वामीनाथ जयसवाल ने बताया कि कोविड-19 महामारी की वजह से देश को अर्थव्यवस्था का जो नुकसान हुआ है, उसका हजाना यह सरकार मजदूर वर्ग से वसूलेगी। आज से करीब 150 साल पहले शिकागो के मजदूरों ने काम के घण्टे 8 करने की लड़ाई शुरू की थी और हजारों कुबॉनियों के बाद पूरी दुनिया में यह लाग हुआ था, आज पासीवादी मोदी सरकार उसे बढ़ाकर 12 घण्टे करने जा रही है। सेक्शन 51, फैक्ट्री एक्ट, 1948 जो कि यह कहता है किसी भी युवा नमिक को फैक्ट्री के अन्दर हफ्ते में 48 घण्टे से अधिक काम नायें करना है- (यानी 1 हफ्ते में 6 दिन और हर कार्यदिवस में पण्टे का काम) उस कानून को संशोधित कर मोदी सरकार काम के घण्टे की 8 से बढ़ाकर 12 करने जा रही है।
गौरतलब है कि फैक्ट्री एक्ट में 4 घण्टे अधिक ओवरटाइम करने का भी प्रावधान है, लेकिन साथ-साथ इस कानून के अनुसार एक श्रमिक एक पैक्ट्री के अंदर 3 महीने में 120 घण्टे से अधिक ओवरटाइम नाहीं कर सकता और ओवरटाइम करने पर मजदूर को दोगुनी दर से भुगतान किये जाने का प्रावधान है। हालांकि भारत की अधिकतम फैक्ट्रियों में यह कानून लागू ही नहीं होता है और मजदूरों को सिंगल रेट से ही भुगतान किया जाता है। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले काफी समय से ही लगातार गिरती हुई नजर आ रही थी, जिसे कोरोना ने बस एक धका देने का काम किया है।
स्वामीनाथ जयसवाल ने कहा कि तमाम श्रम कानूनों को कमजोर करने के बाद अब यह सरकार मजदूरों के काम के बुनियादी अधिकार पर भी हमला करने जा रही है। मुनाफे की गिरती दर को बचाने के लिए यात पासीवादी सरकार मजदूरों का खून चूसने के हर सम्भव प्रयास कर रही है। अब मालिकान मजदूरों की बैटनी भी आसानी से और कानूनी रूप से कर पायेंगे। एक अनुमान के अनुसार काम के घण्टे 12 करने की वजह से करीब 33 फीसदी मजदूरों का काम छुट जायेगा और वे बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हो जायेंगे। जाहिर है सरकार के पास इन बरोजगार मजदूरों के लिए कोई योजना नहीं हो लॉकडाउन के दौरान ही बम मामलों पर स्थापी संसदीय समिति ने सरकार से का कि कोरोना के कारण बन्द हुए कारखानों के मजदूरों को वेतन देने के लिए मालिकों को नहीं कहा जाना चाहिए। उनसे ऐसा करने के लिए कहना मालिकों के साथ अन्याय होगा। समिति ने औद्योगिक सम्बन कोड 2019 पर अपनी रिपोर्ट में कहा कि अगर कच्चा माल नहीं मिलने या मशीन खराब होने जैस कारणों से कारखाने में काम बन्द होता है तब तो मजदूर को उसकी मजदूरी मिलनी चाहिए लेकिन अगर किसी प्राकृतिक आपदा के कारण काम बन्द होता है, तब मजदूरी देने की कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए। समिति ने कहा है कि बाढ़, चक्रवात,भूकम्प आदि के कारण जब लाबे समय तक कारखाने बन्द होते हैं तो इसमें मालिक की कोई गलती नहीं होती। समिति के मुताबिक कोरोना महामारी भी ऐसी ही प्राकृतिक विपदा है इसलिए इसके कारण बन्द हुए कारखानों के मजदूरों को बेतन देना मालिकों की मजबूरी नहीं होनी चाहिए।













