रंग एकादशी पर… शिवजी की होली लीला..

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रंग एकादशी पर…

शिवजी की होली लीला..
एक समय कैलाश पर्वत पर तप साधना में लीन भगवान शिव का ध्यान अचानक से भंग हो गया. उनके मन में पार्वती के संग होली खेलने की तीव्र इच्छा जागृत हो उठी.
मायके गई हुई माँ गौरी के पास शीघ्र अतिशीघ्र पहुंचने की उत्कंठा में प्रभु नंदी एवं अन्य गणों को साथ लिए बिना ही पैदल अकेले ससुराल के लिए चल पड़े.
होली का पर्व आने में अभी कुछ ही दिन शेष रह गये थे, परंतु भोलेनाथ की जिद के आगे माता गौरी को अबीर गुलाल लेकर आना ही पड़ा, जिसके बाद दोनों ने दिव्य होली खेली.
इस पर प्रभु के कंठ पर लिपटे सर्प घबराकर फुफकार मारने लगे. उनकी फुफकार से शीश पर विराजित चंद्र से अमृत की धारा बह निकली. जिसका पान कर भगवान का बाघम्बर जीवित सिंह बन गर्जना करने लगा.
परिणामस्वरूप भोलेनाथ को दिगम्बर अवस्था में देख माता पार्वती अपनी हंसी रोक न सकीं. पुराणों में वर्णित उस अलौकिक दिवस को भविष्य में रंगभरी एकादशी की संज्ञा मिली, जिसे देव होली के रूप में सभी फागुन शुक्ल एकादशी के दिन श्रद्धा भाव से मनाते हैं. (संकलित)

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