राष्ट्रवाद का नारा लगाने वाले देश को खोखला कर रहे हैं स्वामीनाथ जायसवाल

राष्ट्रवाद का नारा लगाने वाले देश को खोखला कर रहे हैं स्वामीनाथ जायसवाल

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नई दिल्ली प्रेस वार्ता में भारतीय राष्ट्रीय मजदूर काँग्रेस (इंटक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते मैं अपने देश के सभी देशवासियों को सचेत कर देना चाहता हूँ कि हमारा देश भयावह स्थिति से गुजर रहा हैं। सामाजिक असमानता बढ़ रही हैं,बेरोजगारी, मंहगाई बढ़ी हैं। समाज के सभी स्तर अस्थिर हैं। आज की स्थिति बहुत चिंताजनक है क्योंकि सरकार की नीतियों की वजह से कोरोना काल में महंगाई, बेरोजगारी बढ़ी है। मौजूदा प्रधानमंत्री अपनी गलतियां मानकर उसे सुधारने की जगह, देश के पहले पीएम नेहरू को जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। मुद्रास्फीति और नौकरियों की कमी दो सबसे बड़ी चिंताएं बनकर उभरी हैं। मगर मंहगाई और बेरोजगारी को बात पर माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी का विरोध किये जाने पर उनके ख़िलाफ़ खड़े विरोधकों के विरोध को कुचला जाता है। सरकार निजीकरण को लेकर तेजी से कदम बढ़ा रही है। सरकार ने वित्त वर्ष 2022 के लिए वित्तीय संस्थाओं और सरकारी कंपनियों में हिस्सा बिक्री के जरिए 1.75 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। निती आयोग को निजीकरण के लिए दो सरकारी बैंकों और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी का नाम देने के लिए कहा गया था, माना जा रहा है कि नीति आयोग ने विनिवेश पर बनी सचिवों के कोर ग्रुप को युनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस का नाम निजीकरण के लिए आगे बढ़ाया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2021-22 के बजट भाषण में निजीकरण को लेकर बड़े ऐलान किए थे, जिसमें दो सरकारी बैंकों और एक जनरल इंश्योरेंस कंपनी का निजीकरण शामिल है। वित्तीय सेक्टर में विनिवेश रणनीति के तहत सरकार ने भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC का IPO लाने का फैसला किया है, साथ ही IDBI बैंक में अपनी बाकी हिस्सेदारी भी सरकार बेचने वाली है। इसको देखते हुये तो ऐसा लगता है कि मोदी सरकार काफी बड़े लेवल पर निजीकरण की प्लानिंग कर रही है। अगर सूत्रों की मानें तो आने वाले वक्त में सरकार के पास सिर्फ 5 बैंक और 2 इंश्योरेंस कंपनियां बचेंगी। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत का ऐलान करने के दौरान कहा था कि वह सभी पब्लिक सेक्टर कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर उनका निजीकरण करेगी। उस ऐलान में सरकारी इंश्योरेंस कंपनियां शामिल नहीं थीं, क्योंकि यह पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग नहीं कहलाती हैं, लेकिन अब मोदी सरकार इंश्योरेंस कंपनियों का भी निजीकरण करने जा रही है। सरकार इन इंश्योरेंस कंपनियों का किस्तों में निजीकरण करने की योजना बना रही है। कोरोना महामारी के आर्थिक दुष्प्रभाव को कम करने के लिए ही भारत सरकार सरकारी कंपनियों को बेच कर संसाधन बटोरना चाहती है, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं है। सरकारी कंपनियों को बेचने का यह जो रास्ता सरकार ने चुना है यह एक तरह से अपेक्षित ही था क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी के पहले से मंदी में थी और महामारी ने तो इसकी कमर ही तोड़ दी। ऐसे में सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि आवश्यक सरकारी खर्च के लिए और आर्थिक गतिविधि के चक्र को चलाने के लिए पैसे लाए तो लाए कहां से। और यही कारण है कि संसाधन जुटाने के लिए सरकार संपत्ति बेचने की बात जरूर करेगी। सरकार अब तेल, गैस, बंदरगाह, हवाई अड्डे, ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में 100 सरकारी संपत्तियों को बेचना चाह रही है। मगर प्रधानमंत्री भूल जाते हैं कि मंदी के इस आलम में कंपनियों की भी तो आर्थिक हालत ठीक नहीं है, तो ऐसे में सरकारी संपत्ति खरीदने के लिए वो खुद कहां से पैसा लाएंगी। इसका नतीजा यह भी हो सकता है कि सरकारी संपत्ति औने पौने दाम में बिक जाएगी, जिससे याराना पूंजीवाद या क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा मिलेगा। महामारी की वजह से हुए नुकसान की वजह से आज सार्वजनिक क्षेत्र की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। बड़ी संख्या में जिन गरीब और माध्यम वर्ग के परिवारों को नुकसान हुआ वो ना निजी अस्पतालों में इलाज के खर्च का बोझ उठा पा रहे हैं और ना निजी स्कूलों की महंगी फीस के बोझ को। उन सब ने अपनी उम्मीदें एक बार फिर सरकार पर टिका दी हैं और ऐसे में कम से कम जन सरोकार के क्षेत्रों में सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती। प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि चार महत्वपूर्ण श्रेणियों को छोड़कर बाकी सभी क्षेत्रों की सरकारी कंपनियों को बेच दिया जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि सरकार हर साल विनिवेश का एक नया लक्ष्य रखती है और उसे हासिल करने से चूक जाती है। चालू वित्तीय वर्ष के लिए 2.10 लाख करोड़ रुपयों के विनिवेश का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन हासिल हो पाए सिर्फ 19,499 करोड़ रुपए। इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए मौजूदा सरकार निजीकरण की मुखालफत कर रही है। मगर प्रधानमंत्री भूल जाते हैं कि निजीकरण द्वारा बड़े उद्योगों को लाभ पहुंचाने के लिए निगमीकरण को प्रोत्साहित किया जाएगा तथा इसके लिये सरकार द्वारा विशुद्ध परिसम्पत्तियों के किताबी मूल्य के आधार पर निर्णय लेकर देश की जनता के साथ कपटपूर्ण व्यवहार किया जायेगा और इसके तहत श्रमिकों की बडे़ पैमाने पर छटंनी और काम के वातावरण में परिवर्तन भी किया जायेगा ।

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