कोरबाछत्तीसगढ़राज्य

ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने सीएम को 8 सूत्रीय मांगों को लेकर सौपा ज्ञापन

ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने सीएम को 8 सूत्रीय मांगों को लेकर सौपा ज्ञापन

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*कटघोरा रेस्ट हाउस में सामाजिक और संगठन प्रतिनिधियों से मुलाकात कार्यक्रम में संगठन के प्रतिनिधियों ने सौजन्य मुलाकात कर भूविस्थापितों की समस्या पर अपनी बात रखी*

*कटघोरा//कोरबा:-*
सन्गठन के पदाधिकारी सपुरन कुलदीप ,विजयपालसिंह , श्यामू जायसवाल , बृजेश श्रीवास ,रुद्रदास महन्त, कुलदीप सिंह राठौर , संतोष दास ने भेंट मुलाकात कार्यक्रम के दौरान सौजन्य मुलाकात किया । भेंट मुलाकात में संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष सपूरन कुलदीप ने कोरबा जिले में पिछले 60 सालों से भूअर्जन से प्रभावित किसानों की पीड़ा और दुर्दशा को विस्तार से बताते हुये भूविस्थापित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग रखी । अपनी बात रखते हुये उन्होंने कहा कि देश और समाज के विकास के लिए आहुति देने वाले मूल निवासी जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की समस्या से जूझ रहे हैं किन्तु उनकी समस्या का निराकरण होने के बजाय और विकराल होते चले जा रही है | घने वनों से घिरे कोरबा जिले में काले हीरे की प्रचुरता के कारण सन 1960-61 से कोयला खदानों के अलावे बिजली सहित अन्य उद्योग भी स्थापित होते चले गए. कोरबा के आसपास बाक्साइड मिलने से एल्युमिनियम कारखाना भी खुला इसके साथ ही अनेक परियोजनाओं का विस्तार होते चला गया जिसके कारण आज कोरवा को ऊर्जाधानी के नाम से जाना जाता है. किन्तु आद्योगिक विकास साथ विस्थापन के शिकार हुए किसानो और उनके परिवार की दशा और दिशा नहीं बदल सका बल्कि उनकी जिंदगी बदतर होते चले गयी विकास की आहुति में केवल कोरबा की जनता को अपनी बलि देने की मजबूरी बनी हुयी है. यही कारण है कि जिन गाँवो की जमीन को जंगलो को उद्योगों ने कारखानों ने निगल लिया है उन गाँवो में पानी, बिजली सडक, शिक्षा, स्वास्थ जैसी बुनयादी समस्याएँ दानव की तरह खड़ी है। आद्योगिकीकरण के 50 से ज्यादा साल गुजर जाने के बावजूद यहाँ के मूल निवासियों को बेरोजगारी, गरीबी के साथ जीवन बसर करने की मजबूरी बन गयी है. ऊपर से पर्यावरण प्रदुषण की संकट से जानलेवा बीमारियों ने जीवन के सालो को आधे से भी कम कर दिया है। . सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक रूप से आदिवासी बहुल कोरबा जिला कंगाल हो चुका है. आजादी के बीते इन 73 सालो में लोंगो का केवल शोषण किया गया है |कोरबा जिले में विगत पांच दशकों से कोयला, बिजली, एल्युमिनियम एवं इनसे जुड़ी अनेक संस्थान कार्यरत है । केवल कोयला खदान परियोजनाओ में 1962 से 2015 तक की स्थिति में ही 62 गावों की जमीन का अधिग्रहण किया गया है | जिसमे लगभग 20000 खातेदारों की जमीन अधिग्रहित कर लिया गया है जिसमे 40% लोंगो ही नियमित रोजगार प्रदान किया गया। इसी तरह अन्य संस्थानों के लिए भी किसानो ने अपनी पुस्तैनी जमीन खोई है | किन्तु कोयला खदान और आद्योगिक संस्थानों की नीतियों के कारण भूविस्थापित परिवारों और प्रभावितों को रोजगार से वंचित होना पड़ रहा है। कोरवा जिले में इतनी बड़े पैमाने पर उद्योग स्थापित होने के बावजूद यहाँ से पलायन की समस्या भी बनी हुयी है। इन आद्योगिक संस्थानों के द्वारा अपने गोद ग्राम, पुनर्वास ग्राम एवं प्रभावित क्षेत्र में आवश्यक मूलभूत सुविधायें प्रदाय नहीं करायी जा रही है। कोरवा जिले के इन विडम्बनाओ और समस्याओ को लेकर सैकड़ो बार आवेदन किया जा चूका है किन्तु समस्याएं ज्यो की त्यों बनी हुयी है, जिला प्रशासन के निर्देशों का पालन भी नहीं हो रहा है। जिसके कारण प्रभावितों को बार-बार आन्दोलन के लिए बाध्य होना पड़ता है।
सन्गठन की ओर से सौपे गए ज्ञापन में समस्याओं को विस्तार से समझाते हुये निराकरण कराने हेतु मांग रखी गयी है जिसमे –

परियोजना एवं एरिया स्तर पर पुनर्वास समिति का गठन एवं छोटे खातेदारों को रोजगार

भाजपा शासन काल वर्ष 2010 में कोरबा जिला के लिए एक जिला पुनर्वास समिति का गठन किया गया था और उस समिति की बैठक 12/12/2010 को कई प्रस्ताव पारित किया गया था जो कि छतीसगढ़ पुनर्वास नीति 2007 के नियम के विरुद्ध थे. इसी बैठक में कोल इण्डिया पालिसी को लागू करने का निर्णय पारित किया किन्तु उससे पूर्व के अर्जन के मामलों पर थोपे जाने से छोटे खातेदारों को रोजगार से वंचित हो जाना पड़ा जबकि उक्त बैठक ग्राम सभाओं, ग्राम प्रतिनिधियों तक को शामिल नहीं कराया गया था कायदे से हर परियोजना स्तर पर पुनर्वास समिति का गठन किया जाना था जो आज पर्यन्त तक नहीं बन पाया है

अतः पुराने प्रस्तावो को निरस्त कर परियोजना स्तर पर पुनर्वास समिति का गठन किया जाए और छोटे खातेदारों को रोजगार प्रदान किया जाये |

शासकीय वन भूमि पट्टे की भूमि में स्थित परिसम्पतियों का 100% सोलिशियम व बसाहट

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एस ई सी एल द्वारा अर्जन से वर्षों पूर्व किसान अपने गाँव की शासकीय अथवा वन भूमि में अपना मकान बनाकर निवास करते आ रहे हैं और पूर्व में मिले पट्टे होने के बावजूद उनको नीति व नियम में पात्रता नहीं होने का हवाला देकर शासकीय वन भूमि तथा पट्टे की भूमि पर निर्मित मकान और अन्य परिसम्पतियों का निजी भूमि पर दी जाने सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है।

अतः राज्य सरकार द्वारा नियमो में यथा संशोधन कर शासकीय वन भूमि पट्टे की भूमि में स्थित मकान व अन्य परिसम्पतियों का 100% सोलिशियम व बसाहट की सुविधा प्रदान किया जाये ।

03 लंबित रोजगार के प्रकरणों का निराकरण

1980 के दशक में एस ई सी एल एवं सी एस ई बी द्वारा जमीन अधिग्रहण कर लिए जाने के बावजूद बहुत से खातेदारों का रोजगार का प्रकरण आज तक लम्बित है ऐसे मामलो का तत्काल निराकरण किया जाना चाहिये | 14/12/2017 को माननीय प्रभारी मंत्री अमर अग्रवाल की उपस्थिति में आयोजित बैठक में एस ई सी एल द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार गेवरा क्षेत्र में 453 कुसमुंडा क्षेत्र में 628 दीपका क्षेत्र में 103 रोजगार के मामले लम्बित थे जिसमें से पात्र लोंगो का चयन कर नौकरी प्रदान करने में देरी किया जा रहा है। अर्जन के बाद जन्म, रैखिक सबंध अलग अलग वर्षो में अर्जन दस्तावेज में कमी अलग-अलग व्यक्तियों के खाता 1सयोंजन आदि कारणों का हवाला देकर रोजगार देने में आनाकानी किया जा रहा है।

इसी तरह से छतीसगढ़ राज्य विद्युत् मंडल ( सी एस ई वी ) के लिए 1978-79 में ग्राम डगनियाखार की 410 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था प्रभावित 54 किसानों को रोजगार और मुआवजा अब तक नहीं दिया गया है और अब उनकी भूमि पर निर्मित राखड बाँध को जोर जबरदस्ती मिटटी पाटकर बंद करने की कार्यवाही कर भूविस्थापितों के साथ अन्याय किया जा रहा है।

लंबित रोजगार के प्रकरणों का निराकरण कर रोजगार और मुआवजा प्रदान किया जाये

04 गांव की आंशिक जमीन अधिग्रहण

एस ई सी एल अपने खदान विस्तार के लिए ग्राम रलिया, मुड़ियानार भिलाई बाजार, बरभाठा, केसला, सलोरा आदि गाँव के आशिक क्षेत्र का अधिग्रहण कर रहा है जिससे रोजगार सहित और कई विषमतायें पैदा हो रही है।

इसलिए आशिंक अधिग्रहण को रद्द कर संपूर्ण रूप से जमीन का अधिग्रहण किया जाना चाहिए ।

05 वर्षो पूर्व अधिग्रहित जमीन का वास्तविक मूल खातेदारों को वापसी

जिले के कोयला और अन्य उद्योगों के लिए सन 1962 से ही जमीन अधिग्रहित की जा रही है किन्तु आज भी कई गाँव में उक्त जमीन पर किसानो का ही भौतिक कब्जा है। कई संस्थाने बंद हो गयी है जिनकी जमीन बेकार पड़ी है ऐसे मामले में राज्य शासन को इन जमींन का हस्तातरण लेकर नया भू अधिग्रहण कानून में निहित भावनाओं के अनुरूप किसानो को वापस किया किया जाए।

ग्राम खम्हरिया, बरपाली, बरम पुर जेलपारा गेवरा, दुरपा आदि गाँव की जमीन सन 1983 में मध्यप्रदेश पुनर्वास निति के लीज तहत अर्जन किया गया था और 20 वर्षों में वापस करने का शर्त रखा गया था ऐसे मामलो में मूल किसानो को जमीन वापसी किया जाए |

06 जिला खनिज न्यास निधि

जिला खनिज न्यास निधि की राशि का उपयोग उसके मूल भावनाओ के आधार पर परियोजना से प्रत्यक्ष प्रभावित ग्रामों पुनर्वास ग्रामो के व्यक्तियों की शिक्षा, स्वास्थ और रोजगार पर भूविस्थापित किसान परिवार के बच्चों को निःशुल्क प्राथमिक-उच्च शिक्षा एवं रोजगार मूलक (मेडिकल, इंजीनियरिंग डिग्री, आई टी बी एड आदि ) शासकीय व अशासकीय कालेजो में सम्पूर्ण खर्च किया जाए। निशुल्क मेडिकल सुविधा, स्वरोजगार व्यवसाय के लिए आर्थिक अनुदान दिया जाये |

07 वैकल्पिक रोजगार
ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति ने सीएम को 8 सूत्रीय मांगों को लेकर सौपा ज्ञापन
संस्थानों से विस्थापित एवं प्रभावित ग्रामो के भूविस्थापितो व्यक्तियों को कोल ट्रांसपोर्टेशन वर्क सहित अन्य ठेका कार्यों में 20% भागीदारी सुनिश्चित किया जाए तथा सभी आउट सोर्सिंग ठेका कम्पनियों में भूविस्थापितो स्थानीय बेरोजगारों को प्राथमिकता दिया जाए। विस्थापित परिवारों को राज्य शासन द्वारा क्रियान्वित रोजगार मूलक लघु उद्योगों के लिए कौशल उन्नयन कर आर्थिक अनुदान देकर व्यवसाय प्रदाय किया जाये |

08 पुनर्वास ग्रामो की समस्या

आद्योगिक संस्थानों द्वारा अपने पुनर्वास ग्रामो को बिना किसी योजना के विस्थापित परिवारों को आवंटित करने के उपरान्त वहां पर सभी मुलभुत सुविधाओ से वंचित कर दिया गया है। 35 साल पहले भूविस्थापित परिवारों को आवंटित हुए क्षेत्र पर नए अर्जन से प्रभावितों को बसाहट के लिए पुराने काविजो के मकानों को तोड़ने और वेदखल करने से ग्रामीणों के बीच आपसी टकराव की स्थिति पैदा कर दिया गया है। जबकि इन पुनर्वास ग्रामो को पूर्ण रूप से सारी मूलभूत सुविधा मुहैया कराने की जरूरत है,आवंटित भूमि का मालिकाना अधिकार पत्र देना चाहिए।

Pradesh Khabar

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