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सौम्या तिवारी: U19 वर्ल्ड कप फ़ाइनल की टॉप स्कोरर को कितना जानते हैं आप

सौम्या तिवारी: U19 वर्ल्ड कप फ़ाइनल की टॉप स्कोरर को कितना जानते हैं आप

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“घर में वो मोगरी (कपड़े धोने वाले बैट) से खेलती थी. फिर सौम्या और उसकी बड़ी बहन साक्षी घर के नीचे क्रिकेट खेलने लगीं और कुछ दिनों बाद मोहल्ले के मैदान में. बहन ही उसे अरेरा क्रिकेट क्लब लेकर गई और अब वो अंडर-19 टीम की उपकप्तान हैं.”

स्कूटर संभालकर सौम्या के पिता मनीष तिवारी ने बड़े इत्मीनान से अपनी बिटिया के बारे में कई बातें कहीं.

भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने अंडर-19 टी-20 वर्ल्ड कप में इंग्लैंड को सात विकेट से हरा दिया है. इस मैच में सबसे अधिक नाबाद 24 रन सौम्या तिवारी ने बनाए.

सौम्या भोपाल की पहली महिला क्रिकेटर हैं जिन्होंने टीम इंडिया की नीली जर्सी पहनी है. भोपाल की अरेरा अकादमी से इंडिया टीम तक का सफ़र उन्होंने महज़ छह साल में ही पूरा कर लिया.

सौम्या के पिता मनीष तिवारी कलेक्टर दफ़्तर की निर्वाचन शाखा में सुपरवाइज़र हैं. वो ख़ुद भी क्रिकेट खेलते थे, लेकिन 1986 में स्कूटर से ऐसा हादसा हुआ कि पैर की हड्डी के दो टुकड़े हो गए और पेशेवर क्रिकेट खेलने का सपना भी टूट गया. लेकिन मनीष तिवारी का यह सपना उनकी बेटी की आंखों में पलने लगा.

कैसे हुई शुरुआत

तिवारी कहते हैं, “हम पुराने भोपाल के शाहजहानाबाद में रहते थे. 2000 के बाद नए भोपाल के गौतम नगर इलाक़े में आए. मुझे क्रिकेट खेलने और देखने का शौक़ था, इसलिए मेरे साथ पूरा परिवार भी क्रिकेट का शौक़ीन बन गया.

“सौम्या मोगरी और प्लास्टिक की बॉल से घर में क्रिकेट खेलती थी. 5 साल की उम्र में मोहल्ले के मैदान में बच्चों को क्रिकेट खेलता देख उसे पैड और हेलमेट पहनने का शौक़ पैदा हुआ. 2016 में गर्मी की छुट्टियों के दौरान उसकी बहन उसे ओल्ड कैंपियन स्कूल में समर कैंप में लेकर गई.”

वो कहते हैं, “दूसरे दिन जब वो आई तो ज़िद करने लगी कि सर ने कहा है क्रिकेट की किट चाहिए. मैंने समझाने की कोशिश की, तो वो अड़ गई और कहा कि सर ने कहा है कि किट के साथ ही मैदान में आना है तो मैंने सबसे सस्ता किट खरीद कर दे दिया. अब हमारे ज़माने में तो हम एक पैड से, कॉर्क बॉल से मैट पर खेलते थे, लेकिन सौम्या ने पूरा किट ख़रीदा.”

सौम्या ऑलराउंडर हैं. ताबड़तोड़ बल्लेबाज़ी के साथ वो ऑफ़ स्पिन गेंदबाज़ी भी करती हैं. 6-7 सालों के सफ़र में उन्होंने ये कामयाबी हासिल की है, इस कहानी के अहम किरदार उनके कोच सुरेश चेनानी हैं.

चेनानी बताते हैं कि जब सौम्या की बड़ी बहन उसे अकादमी लेकर आई थीं तो उन्होंने कोचिंग देने से मना कर दिया था.

वो कहते हैं, “मैं 2000 में लड़कियों को कोचिंग देता था. उस वक़्त एक बच्ची श्वेता मिश्रा अंडर-19 इंडिया कैंप के संभावितों में चयनित हुई थी. 2008 में इंडिया टीम का कैंप करने के बाद जब उसका चयन नहीं हुआ तो वो घर बैठ गई. इसी तरह एक और लड़की थी. फिर मेरा मन खट्टा हो गया.”

“मैं लड़कियों पर मेहनत करता हूं कि ये लड़कियां लड़कों से अच्छा करें और भोपाल का नाम आगे बढ़ाएं. इसीलिए मैंने सौम्या को मना कर दिया, लेकिन वो ज़िद पर अड़ गई कि सर मुझे आपसे ही कोचिंग लेनी है. वो बराबर आती रही, फिर मैंने जूनियर ग्रुप में उसे रखा.”

लड़कों के टूर्नामेंट में फ़ील्डिंग

चेनानी के अनुसार, “थोड़े दिनों बाद इसी मैदान पर अंडर-14 इंटर एकेडमी लड़कों का टूर्नामेंट हो रहा था. वो आकर खड़ी हो गई और बोली सर मुझे मैच खेलना है, तो मैंने कहा कि बेटा ये प्रैक्टिस नहीं टूर्नामेंट का मैच है और आप अभी नए हो तो ऐसा नहीं चलेगा. इस पर वो बहुत रुआंसी हो गई और घर जाकर अपने पापा को बताया.”

वो कहते हैं, “उनके पापा ने मुझे फ़ोन किया और बोले कि फ़ील्डिंग ही करवा दो. तब मैंने कहा कि ठीक है सामने वाली टीम से बोलकर ये करवा सकते हैं. उन्होंने परमिशन दे दी, उस मैच में इसने लड़कों से कहीं ज़्यादा अच्छी फ़ील्डिंग की, तब मैंने सोचा कि इस पर अच्छी मेहनत करते हैं. उसके बाद इसे ऑफ़ स्पिनर के तौर पर तैयार किया. उसके बाद इसका डिविज़न में सेलेक्शन हो गया.”

“डिविज़न के बाद स्कूल नेशनल के लिए चयन हुआ जिसे खेलने वो खंडवा गई. उसी वक़्त भोपाल के एमवीएम कॉलेज में लड़कों का अंडर-14 टूर्नामेंट हो रहा था. मुझे भरोसा था कि ये आएगी तो मेरी टीम और मज़बूत हो जाएगी और इसका भी आत्मविश्वास बढ़ेगा. मैंने इसे रात में फ़ोन किया और कहा कि सुबह मैदान पर आ जाओ. वो सुबह 4 बजे भोपाल पहुंची. उस दिन उसने 6 ओवर में मात्र 18 रन देकर 6 विकेट लिए, तब पूरा भोपाल आश्चर्य में आ गया कि ये कौन सी बच्ची है, कहां से आई है. उस समय इसकी उम्र महज़ 11-12 साल थी.”

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“उस प्रदर्शन के बाद मैंने इसकी बैटिंग पर भी ध्यान दिया. एक साल बाद ऑलसेंट कॉलेज में अंडर 14 टूर्नामेंट हुआ तो मैंने दो और लड़कियों को मौक़ा दिया. सौम्या ने पहले ही मैच में सीहोर के ख़िलाफ़ 100 रनों की पारी खेली. इस तरह मेरा विश्वास भी बढ़ता गया.”

लड़कों के बीच जमाई धाक

सौम्या ईदगाह हिल्स स्थित सेंट जोसेफ़ कॉन्वेंट में 12वीं की छात्रा है. अपने कोच की बात उन्होंने लड़कों के बीच धाक जमाकर साबित की. यह धाक स्कोरबोर्ड पर भी दिखती है.

उनके कोच चेनानी बताते हैं, “सौम्या जब 14-15 साल की थी, तभी मध्यप्रदेश की अंडर-19 टीम में इसका चयन हो गया और फिर अंडर-23 में आ गई. पिछले 2 साल से अंडर-19 में इतना अच्छा कर रही थी कि अपनी टीम को पिछले साल जयपुर में रनर-अप बनाया. चैलेंजर ट्रॉफ़ी में मौका मिला तो पहले मैच में ही नाबाद 105 रन बना दिया.”

वो बताते हैं, “हाल में अंडर 19 टी 20 टूर्नामेंट हुआ तो इसने मप्र को चैंपियन बनाया. सारे मैचों में एकतरफ़ा प्रदर्शन किया. न्यूज़ीलैंड के साथ 5 मैचों की सिरीज़ में ढेर सारे रन बटोरे.”

“उसमें लगन और समझ है. 6 साल क्रिकेट को दिया और अब इंडिया खेल रही है. इतना प्रतिभाशाली कम ही बच्चा होता है. वो लड़कों पर भारी है. जो हमने सिखाया वो उसे फ़ौरन सीखती है. इसने दिखाया है कि जहां रहेगी लड़कों से बेहतर करेगी.”

विराट कोहली सौम्या के पसंदीदा क्रिकेटर हैं, वो कोहली की तरह 18 नंबर की जर्सी पहनती हैं और उन्हीं की तरह बल्लेबाज़ी करने की कोशिश करती हैं.

लड़कों की टीम का आधे मैच में खेलने से इनकार

उनके कोच चेनानी लड़कों के साथ सौम्या के खेलने के दौरान हुई एक दिलचस्प घटना भी बताते हैं.

“एक टूर्नामेंट था ऑयकॉनिक कप. हमने सौम्या का नाम दिया. इसने बैटिंग कर ली, लेकिन टीम जब फ़ील्डिंग करने उतरी तो गेंद सौम्या के हाथ में थी. तब विपक्षी टीम ने आपत्ति की कि वे लड़कियों को नहीं खिलाते. हमने कहा जब हमने टीम का नाम दिया, तब आपने आपत्ति नहीं की. उसने बल्लेबाज़ी कर ली, तब भी आपत्ति नहीं हुई. अब आप आपत्ति कर रहे हैं ये ठीक नहीं है. हम अपनी टीम ले जा रहे हैं, लेकिन वो नहीं माने.”

“मेरे लिये बहुत बेइज़्ज़ती वाली बात थी, लेकिन वो नहीं माने. और तब सौम्या सामने आई और कहा कि सर प्लीज़, आप टीम को खेलने दीजिए, मैं बाहर बैठ जाती हूं. तो उसकी ये खेल भावना थी कि उसने अपने स्वाभिमान के आगे टीम भावना को रखा.”

“भोपाल में ये ट्रेंड था कि लड़कियां, लड़कों के साथ नहीं खेलती थीं. सामने वाली टीम को भी लगता था ये लड़की है क्या ही कर लेगी. लेकिन जब इसने रंग दिखाना शुरू किया, तो सब इसके नाम से घबराने लगे. बोलने लगे कि नहीं, हम इसे नहीं खिलाएंगे, हम लड़कों के साथ ही खेलेंगे.”

सौम्या की कप्तानी में मध्य प्रदेश ने अंतरराज्यीय महिला अंडर-19 टी-20 टूर्नामेंट में कर्नाटक को 26 रन से हराकर ख़िताब जीत लिया.

इस सिरीज़ में कप्तान के रूप में सौम्या ने 8 पारियों में 255 रन बनाए. बतौर गेंदबाज़ इन 8 मैचों में उसने 15 विकेट भी लिए, जो टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा था.

उनके कोच सौम्या की कप्तानी कौशल की तारीफ़ करते हुए एक और क़िस्सा बताते हैं.

उन्होंने बताया, “पिछले साल तहसीन सगीर टूर्नामेंट था जिसमें सौम्या कप्तानी कर रही थी. 40 ओवर का मैच था. फ़ाइनल चल रहा था, 128 पर टीम ऑल आउट हो गई. हमें लगने लगा कि हम हार जाएंगे, लेकिन सौम्या की कप्तानी में बच्चों ने ग़ज़ब की फ़ील्डिंग की.

“उस मैच में सौम्या ने तीन विकेट लिए. उसने ग़ज़ब का कैच पकड़ा. आख़िर में उन्हें मात्र आठ रन चाहिए थे और तीन विकेट बाक़ी थे. सौम्या ने दांव खेला और दूसरी लड़की श्रेया दीक्षित को बॉलिंग दी. वहां श्रेया ने एक ओवर में तीन विकेट ले लिए और हम छह रन से मैच जीत गए. इससे मुझे भरोसा हुआ कि ये लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं.”

जश्न मनाने को लेकर परिवार सतर्क

हाल ही में समाप्त चार देशों की महिला अंडर-19 टी-20 सिरीज़ में सौम्या ने 102 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए. इस सिरीज़ में श्रीलंका, वेस्टइंडीज, टीम इंडिया ‘ए’ और टीम इंडिया ‘बी’ खेली.

सौम्या के पिता मनीष तिवारी खुशी ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि ‘हमने क़दम दर क़दम सौम्या को आगे बढ़ते देखा है, मोहल्ले से राज्य और फिर देश के लिए खेलना.’

वो कहते हैं कि ‘लक्ष्य अभी सीनियर टीम है, इसलिए उसे मंज़िल की तरफ़ बढ़ते जाना है. हमने ख़ुशी मनाई है, लेकिन उसकी ही तरह संभल-संभल कर.’

Ashish Sinha

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