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यौन अपराध के मामलों में दखल देने से बचे हाईकोर्ट : इलाहाबाद हाईकोर्ट

यौन अपराध के मामलों में दखल देने से बचे हाईकोर्ट : इलाहाबाद हाईकोर्ट

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश),इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय को आम तौर पर केवल समझौते के आधार पर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, हालांकि यह पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं है। ऐसे मामलों में, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत निहित शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में, कुछ शर्तों को ध्यान में रखते हुए समझौते के लिए उपयुक्त मामलों की पहचान करने के लिए एक अलग दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने इन टिप्पणियों को करते हुए बुधवार को बरेली जिला अदालत के समक्ष आवेदक फकरे आलम के खिलाफ बलात्कार और पॉक्सो अधिनियम के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

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उच्च न्यायालय ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत निहित शक्तियों के तहत फकरे आलम द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की, उच्च न्यायालय को आम तौर पर केवल समझौते के आधार पर महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराध से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, हालांकि यह पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं है। ऐसे मामलों में, सीआरपीसी की धारा 482 के तहत निहित शक्ति का प्रयोग कर सकता है।

फकरे आलम ने बरेली की एक अदालत में अपने खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही को इस आधार पर चुनौती दी थी कि पीड़िता ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में कहा था कि उसने आरोपी से स्वेच्छा से शादी की थी और पीड़िता की मां ने उसके पति (आवेदक) से पांच लाख रुपये ऐंठने के लिए बलात्कार का झूठा मामला दायर किया था।

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