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‘झूठा सारे लोक में, नातों का यह जाल, सत्य-प्रेम की मूर्ति हैं, एक यशोदा लाल’

‘झूठा सारे लोक में, नातों का यह जाल, सत्य-प्रेम की मूर्ति हैं, एक यशोदा लाल’

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श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी पर्व के उपलक्ष्य में तुलसी साहित्य समिति की सरस काव्यगोष्ठी

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अम्बिकापुर। श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी पर्व के उपलक्ष्य में गीता मर्मज्ञ पं. रामनारायण शर्मा के मुख्य आतिथ्य में तुलसी साहित्य समिति के द्वारा केशरवानी भवन में सरस काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शायर-ए-शयर यादव विकास ने की। वरिष्ठ गीतकार रंजीत सारथी, कवयित्री आशा पांडेय और पं. चन्द्रभूषण मिश्र विशिष्ट अतिथि थे। संचालन संस्था की उपाध्यक्ष कवयित्री व अभिनेत्री अर्चना पाठक ने किया।
गोष्ठी का शुभारंभ भगवान श्रीकृष्ण और मां शारदा की सामूहिक पूजा-अर्चना से हुआ। संस्था की कार्यकारी अध्यक्ष कवयित्री माधुरी जायसवाल ने मां वीणावती की मनोहर भक्ति-आराधना की। पं. रामनारायण शर्मा ने कहा कि आज से लगभग 5250 वर्ष पूर्व कंस के कारागार में एक महान् विभूति का प्राकट्य हुआ था, जिन्हें संसार श्रीकृष्ण के रूप में जानता है। वह समय द्वापरयुग का था तब सर्वत्र अधर्म, अत्याचार और अनाचार का बोलबाला था। तत्कालीन राजा-महाराजा जनता का स्वत्व छीन कर लूट-खसोट करने लगे थे। बलवान् निर्बलों को सताने लगे थे। चारों ओर हाहाकार मचा था। तब सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का दमन करने के लिए भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण का साकार रूप धारण किया। उनका लालन-पालन वसुदेव-देवकी के मित्र गोकुलवासी नंद-यशोदा ने किया। बचपन में ही भगवान् श्रीकृष्ण ने कंस के द्वारा भेजे गये पूतना, अघासुर, बकासुर, शकटासुर, तृणावर्त आदि राक्षसों का संहार किया और किशोरावस्था में अपने मातुल कंस का वध कर उनके अत्याचारों से जनता को मुक्ति दिलाई। एक आदर्श पुत्र, मित्र, भाई, शिष्य, प्रेमी, पति, पिता, गुरु यहां तक कि जगत्गुरु की भूमिकाओं का उन्होंने बखूबी निर्वहन किया। योगेश्वर श्रीकृष्ण का विशाल व्यक्तित्व और कृतित्व सभी के लिए अत्यंत प्रेरणाप्रद है। उन्होंने महाभारत के समरांगण में युद्ध विमुख, विषादग्रस्त अर्जुन को लक्ष्य करके सम्पूर्ण मानवों के कल्याण के लिए गीता का दिव्य व सार्वकालिक संदेश दिया। पं. अरविंद मिश्र का कहना था कि जिस प्रकार वायु किसी सुगंधित पुष्प से उसकी सुगंध लेकर उड़ जाती है उसी प्रकार आत्मा शरीर से निकलते समय छः प्राणों के संस्कार लेकर उड़ जाती है। शरीर नाशवान है तो उसके अंदर स्थित चेतन तत्व आत्मा अविनाशी है। पेंशनर्स समाज के जिलाध्यक्ष हरिशंकर सिंह ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया और सबको श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी पर्व की शुभकानाएं दीं और कहा कि श्रीकृष्ण भारतीय मनीषा और लोकचेतना के सहज स्वर हैं। वे भक्ति, ज्ञान और योग की साक्षात् प्रतिमूर्ति और प्रतिपादक हैं। वे समाज, धर्म के संरक्षक भी हैं। वे सभी प्राणियों के हित में सर्वदा लगे रहनेवाले निष्काम कर्मयोगी हैं। वे वास्तव में पूर्णांवतार हैं।
काव्यगोष्ठी में संस्था के अध्यक्ष दोहाकार व शायर मुकुंदलाल साहू ने भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित कर अनेक दोहे सुनाए और सबको भावविभोर कर दिया- झूठा सारे लोक में, नातों का यह जाल। सत्य-प्रेम की मूर्ति हैं, एक यशोदा लाल। पुकारते हैं हरि तुम्हें, लोक और परलोक। कान्हा! तुम हरते रहो, जन-जन के दुख-शोक। कवि अजय श्रीवास्तव ने गिरिधर-गोपाल के प्रेम के वशीभूत होने की बात कही- जिनके पलक झपकने से युग-परिवर्तन होता है, जिनके भृकुटि के इशारे से ये चंद्र-सूर्य निकलते हैं, जिनकी मर्जी के बिना पत्ते भी खड़क नहीं पाते, मेरे ऐसे कान्हा को ये ब्रज की सारी छोरियां, छछियाभर छाछ की ख़ातिर उंगलियों में नाच नचाती हैं- यह प्यार में संभव होता है, हां यह प्यार में ही संभव होता है। कवयित्री माधुरी जायसवाल ने अपने काव्य में वेणुवादक श्रीकृष्ण को दुःखहर्ता बताया- जिनकी मुरली मनोहर है, जो ब्रज की धरोहर हैं, वो ही तो नंदगोपाला हैं। बंशी की धुन पर हम सभी का दुख हरनेवाला है! कवयित्री आशा पांडेय ने भी केशव की बांसुरी की तारीफ़ अपने दोहे में की- मुरली माधव की जहां, छेड़े सुंदर तान। दौड़ी आतीं गौपियां, करने को रसपान। रास रचैया कृष्ण का, वृंदावन है धाम। सुंदर जोड़ी प्रेम की, है राधा-घनश्याम। कवयित्री अर्चना पाठक ने गीता-ज्ञान के द्वारा सुषुप्त संसार को जागृत करने हेतु भगवान श्रीकृष्ण का आह्वान किया- गीता का उपदेश सुनाकर दिव्य ज्ञान फैलाओ, सोए हुए जगत् को कान्हा आकर पुनः जगाओ। नारी की रक्षा करने तुम हरदम कान्हा आओ। हर परित्यक्ता वनिता को अपनी भामिनी बनाओ। महान् गीताग्रंथ की महिमा कवि प्रकाश कश्यप के गीत में गुंजारित हुआ- गीता ज्ञान की गंगा हमें तरना सिखाती है। रहे संशय न मन में कौन अपना और पराया है। मिटाकर मोह मन का, दुख हमें हरना सिखाती है! मधुर कंठ के धनी वरिष्ठ गीतकार रंजीत सारथी ने सरगुजिहा में सुमधुर गीत सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया- मन मोहना कन्हैया मोर मया मां बांध डारे। कहां गए मन मोहि के मोहना, बंशी ला तैंहा बजा के, रद्दा निहारथे ब्याकुल नैना रोवत हे धरधरा के! गीतकार सीमा तिवारी ने भी अपने गीत में मीरा का दृष्टांत देकर अपने श्रीकृष्ण-प्रेम को उजागर किया- मोहन तेरी मुरलिया बाज रही, मैं जोगन तेरी नाच रही। रंगी थी मीरा तेरे रंग में, पी गई प्याला ज़हर तेरी उमंग में। जीत रही ओ जीत रही प्रेम को अपने जीत रही!
गोष्ठी में कविवर श्यामबिहारी पांडेय ने अपने गीत में गोविंद को सबका प्यारा और सहारा बताया- सबको अपना दुलारा किशन चाहिए, दुख में सबका सहारा किशन चाहिए। दर्द में भी न आंसू गिरे आंख से। खुशिया बांटे हमरा किशन चाहिए! वीर रस के कवि अम्बरीष कश्यप को जिं़दगी पांडवों-जैसी प्रतीत हुई तभी तो वे बुदबुदा उठे- पांडवों-जैसी ज़िंदगी है यहां, मुझको लगता हम जुआरी हैं। कौन जीता है खेल के पत्ते, जिसको देखो वही भिखारी है! मन, बुद्धि, आचार-विचार की शुद्धता व संयम के लिए कविवर विनोद हर्ष ने व्रत की आवश्यकता बताई- त्योहार मनाने का कुछ अदब अपने पास रखिए। कुछ रखें न रखें ज़रूर एक दिन का उपवास रखिए। इनके अलावा कविवर चंद्रभूषण मिश्रण ‘मृगांक’ की कविता- लम्हा-लम्हा तेरी तस्वीर सामने आती है, मेरे जीने का अंदाज़ बदल जाता है, कवि रामलाल विश्वकर्मा की कविता- थोड़ी-सी फिक्र अपनों की, रिश्ते बरकरार रखती है, वरिष्ठ गीतकार उमाकांत पांडेय का गीत- तुम तो आते हो फ़कत दिल को दुखाने के लिए, कभी तो आया करो मुझको मनाने के लिए ओर आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर की रचना- नित्य दुर्घटना में मौत, मातम पसरता तड़के, कब तक बनेंगी हुजूर सरगुजा संभाग की सड़कें- को श्रोताओं ने खूब सराहा। अंत में, शायर-ए-शहर यादव विकास की इस अनमोल ग़ज़ल से कार्यक्रम का यादगार समापन हुआ- क्या-क्या, कब-कब गुज़रती है, यह जिं़दगी चलती रहती है। वक़्त की किताब ये कहती है, मुझसे ही ज़िंदगी हंसती है। धूप-छांव ही जिं़दगी है विकास, आखि़र तक चलती रहती है! आभार-ज्ञापन संस्था की उपाध्यक्ष कवयित्री आशा पांडेय ने किया। कार्यक्रम की रिकार्डिंग आकाशवाणी अम्बिकापुर द्वारा की गई। इस अवसर पर लीला यादव, केके त्रिपाठी, मदालसा गुप्ता, अंजनी कुमार पांडेय, राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता, प्रमोद और केशरवानी वैश्य समाज के उपाध्यक्ष मनीलाल गुप्ता सहित बड़ी संख्या में काव्यप्रेमी उपस्थित रहे।

Ashish Sinha

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