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भू-जल संरक्षण पर कार्यशाला: सामूहिक प्रयासों से जल संकट का समाधान संभव

भू-जल संरक्षण पर कार्यशाला: सामूहिक प्रयासों से जल संकट का समाधान संभव

गरियाबंद, 17 मार्च 2025 – जिला पंचायत सभाकक्ष में आज भू-जल प्रबंधन एवं संरक्षण पर तृतीय स्तरीय प्रशिक्षण एवं जल संवाद कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड रायपुर के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. प्रवीर कुमार नायक, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जी.आर. मरकाम सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारी शामिल हुए। कार्यक्रम की शुरुआत जल कलश में जल डालकर की गई, जिसके बाद उपस्थित अधिकारियों और कर्मचारियों को जल संरक्षण और विवेकपूर्ण जल उपयोग की शपथ दिलाई गई।

जल संरक्षण के महत्व पर जोर
कार्यशाला में जिला कलेक्टर दीपक कुमार अग्रवाल ने भू-जल स्तर के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि जल संरक्षण को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो आने वाले समय में गंभीर जल संकट उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों और आम नागरिकों से मिलकर भू-जल स्तर को बनाए रखने हेतु प्रभावी उपाय अपनाने की अपील की।

कलेक्टर ने जल संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि पंचायत स्तर पर जल संकट से निपटने के लिए स्थानों की पहचान कर जल संरक्षण योजनाओं को लागू किया जाना चाहिए। इसके लिए रेनवाटर हार्वेस्टिंग, वॉटर रिचार्ज स्ट्रक्चर, नाले और तालाब जैसे संसाधनों को विकसित करने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने जल संसाधन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, कृषि, वन और अन्य संबंधित विभागों के साथ-साथ पंचायतों और नगरीय निकायों को भी जल संरक्षण प्रयासों में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया।

समाज की सहभागिता से जल संकट का समाधान
कलेक्टर ने कहा कि जल संरक्षण सिर्फ प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें आम नागरिकों, किसानों और अन्य समुदायों को भी जागरूकता के साथ भागीदार बनाना जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि कृषि क्षेत्र में जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए किसानों को परंपरागत जल-गहन फसलों के बजाय कम जल खपत वाली फसलों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए। उन्होंने कृषि विभाग को किसानों को धान और अन्य फसलों की तुलनात्मक जानकारी देने के निर्देश दिए ताकि वे जल संरक्षण के महत्व को समझते हुए वैकल्पिक फसलों को अपना सकें।

कलेक्टर ने अधिकारियों को जल संरक्षण योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश दिए। उन्होंने जनपद पंचायत के सीईओ को निर्देशित किया कि उन गांवों की सूची एक सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करें, जहां नलकूपों के माध्यम से तालाबों में जल पुनर्भरण का कार्य किया जा रहा है।

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जल संरक्षण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण
कार्यशाला के दौरान केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. प्रवीर कुमार नायक ने छत्तीसगढ़ में धान की खेती के कारण जल खपत पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि राज्य में कुल जल खपत का 80 प्रतिशत हिस्सा धान की खेती में खर्च हो जाता है, जिससे भू-जल स्तर में गिरावट आ रही है। उन्होंने जल संरक्षण के लिए सामूहिक इच्छाशक्ति और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. मनीष चौरसिया ने जल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि किसानों को श्री पद्धति से धान की खेती करनी चाहिए। इस पद्धति से खेती करने से जल की बचत होती है और उत्पादन भी बेहतर होता है। उन्होंने बताया कि खेत में एक-दो इंच पानी बनाए रखते हुए भी खेती की जा सकती है और इससे धान की फसल को बीमारियों से भी बचाया जा सकता है।

जल प्रबंधन के लिए ठोस रणनीति की जरूरत
कार्यशाला में जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता एस.के. बर्मन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के कार्यपालन अभियंता विप्लव घृतलहरे, कृषि विभाग के उप संचालक चंदन रॉय और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. गार्गी यदु पाल सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित थे।

कार्यशाला के दौरान जल प्रबंधन को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए गए। प्रशासन ने तय किया कि जिले के शहरी और ग्रामीण इलाकों में जल संरक्षण के लिए उपयुक्त स्थानों को चिन्हित कर वहां पर जल संरचनाएं बनाई जाएंगी। साथ ही, आम नागरिकों और किसानों को जल संरक्षण की दिशा में और अधिक जागरूक किया जाएगा।

इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य जिले में भू-जल स्तर को सुधारने के लिए प्रशासन और नागरिकों के सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना था। प्रशासन की ओर से जल संरक्षण को लेकर उठाए गए कदमों के अलावा, स्थानीय नागरिकों और किसानों को भी जल संचयन और भू-जल पुनर्भरण की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की गई।

कार्यशाला में उपस्थित विशेषज्ञों ने जल संकट को दूर करने के लिए विभिन्न उपायों की चर्चा की और भविष्य में जल प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक ठोस रणनीति बनाने पर जोर दिया। इस कार्यशाला से यह स्पष्ट हुआ कि जल संरक्षण के लिए प्रशासनिक प्रयासों के साथ-साथ नागरिकों की सहभागिता भी आवश्यक है, जिससे जल संकट से निपटने और भविष्य के लिए जल संसाधनों को संरक्षित करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकें।

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