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भागवत के बयान से काशी–मथुरा विवाद गरमाया, आरएसएस की दोरंगी चाल पर उठे सवाल

आरएसएस : दोरंगी चाल के सौ साल, भागवत के बयान से उठा नया विवाद

नई दिल्ली, 6 सितम्बर 2025।आरएसएस की स्थापना के 100 साल पूरे होने पर दिल्ली में आयोजित विशेष व्याख्यान के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान ने काशी और मथुरा विवाद को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

भागवत ने कहा कि अयोध्या आंदोलन में आरएसएस ने सक्रिय भूमिका निभाई थी, लेकिन अब काशी और मथुरा प्रकरणों में संगठन आंदोलन का हिस्सा नहीं बनेगा। हालांकि, उन्होंने हिंदुओं की भावनाओं का हवाला देते हुए यह भी कहा कि संघ से जुड़े स्वयंसेवक और संगठन इन आंदोलनों में शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही उन्होंने मुसलमानों से अपील की कि वे “भाईचारे की खातिर” काशी और मथुरा मस्जिदों पर अपना दावा छोड़ दें।

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विश्लेषकों का कहना है कि यह रुख आरएसएस की पुरानी दोरंगी रणनीति की ही कड़ी है। बाहर से दूरी दिखाने और अंदर से समर्थन देने की यह नीति, अयोध्या आंदोलन के बाद भी लगातार देखी गई है। हाल के वर्षों में काशी और मथुरा के अलावा कई मुस्लिम धार्मिक स्थलों पर नए विवाद खड़े किए गए, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद ही रोका जा सका।

इतिहासकारों और राजनीतिक टिप्पणीकारों के मुताबिक, आरएसएस की स्थापना से लेकर आज तक उसकी मुख्य पहचान हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर सांप्रदायिक गोलबंदी रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से दूरी, महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगा प्रतिबंध और बाद में राजनीति से अलग रहने का वादा—सब इसके बावजूद, आरएसएस ने हमेशा परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक हस्तक्षेप बनाए रखा।

2014 के बाद नरेंद्र मोदी सरकार के दौर में यह प्रवृत्ति और गहरी हुई है। सांस्कृतिक संगठन का चोला उतारकर संघ अब सीधे राजनीतिक रणनीतियों में सक्रिय नजर आ रहा है, जबकि औपचारिक रूप से ‘गैर-राजनीतिक’ होने का दावा भी जारी है।

(आलेख : राजेंद्र शर्मा, संपादक – लोकलहर)

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