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पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जयंती 2026: ‘युवा तुर्क’ के जीवन और संघर्ष की पूरी कहानी






पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जयंती: ‘युवा तुर्क’ के संघर्ष और सिद्धांतों की गौरव गाथा


विशेष श्रद्धांजलि

चंद्रशेखर जयंती: बलिया के ‘बागी’ से देश के प्रधानमंत्री तक का बेबाक सफर

भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘युवा तुर्क’ के नाम से अपनी पहचान बनाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की आज 99वीं जन्म जयंती है। 17 अप्रैल 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी में जन्मे चंद्रशेखर ने ताउम्र उन सिद्धांतों की राजनीति की, जिसे उन्होंने सही माना। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने सत्ता के लिए कभी समझौता नहीं किया और आपातकाल के दौरान अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ खड़े होने का साहस दिखाया।

“राजनीति मेरे लिए केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज बनने का एक जरिया है।” — चंद्रशेखर

1. प्रारंभिक जीवन और समाजवादी विचारधारा का प्रभाव

चंद्रशेखर जी का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनकी उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई, जो उस समय ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’ कहलाता था। यहीं से उनके भीतर समाजवादी विचारों का बीजारोपण हुआ। डॉ. राममनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव के विचारों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने छात्र जीवन से ही अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया था।

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2. ‘युवा तुर्क’ का उदय और आपातकाल का संघर्ष

1960 के दशक में जब वे कांग्रेस में शामिल हुए, तो उन्होंने पार्टी के भीतर ही नीतियों पर सवाल उठाना शुरू किया। चंद्रशेखर, मोहन धारिया और कृष्णकांत जैसे नेताओं के समूह को ‘युवा तुर्क’ कहा जाने लगा। 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल (Emergency) की घोषणा की, तो चंद्रशेखर कांग्रेस के उन गिने-चुने नेताओं में से थे जिन्होंने इसका खुलकर विरोध किया। परिणामस्वरुप, उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

3. ऐतिहासिक ‘भारत यात्रा’ (1983)

चंद्रशेखर जी के राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव उनकी ‘भारत यात्रा’ थी। 6 जनवरी 1983 को उन्होंने कन्याकुमारी से अपनी पदयात्रा शुरू की, जो दिल्ली के राजघाट पर समाप्त हुई। 4000 किलोमीटर से अधिक की इस यात्रा के माध्यम से उन्होंने देश की जमीनी समस्याओं, गरीबी और ग्रामीण भारत के दुख-दर्द को करीब से समझा। यह पदयात्रा भारतीय राजनीति में जनसंपर्क का एक अनूठा उदाहरण बनी।

प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल (1990-1991)

वे 10 नवंबर 1990 से 21 जून 1991 तक भारत के 8वें प्रधानमंत्री रहे। हालांकि उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन उन्होंने बेहद चुनौतीपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों में देश का नेतृत्व किया। बाबरी मस्जिद विवाद और आर्थिक संकट जैसे मुद्दों पर उनके बेबाक रुख की आज भी चर्चा होती है।

4. राजनीतिक सफर के मुख्य पड़ाव

1927 उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्म।
1962 पहली बार राज्यसभा के लिए चुने गए।
1977 जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष बने।
1983 कन्याकुमारी से दिल्ली तक की ऐतिहासिक पदयात्रा।
1990 भारत के 8वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
2007 8 जुलाई को दिल्ली में अंतिम सांस ली।

5. वर्तमान राजनीति में उनकी प्रासंगिकता

आज 2026 में, जब भारतीय राजनीति वैचारिक रूप से कई बदलावों से गुजर रही है, चंद्रशेखर जी के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। वे ‘सिद्धांतविहीन राजनीति’ के घोर विरोधी थे। उन्होंने हमेशा संसदीय मर्यादाओं का पालन किया और सदन में उनके भाषण आज भी नए सांसदों के लिए एक पाठशाला की तरह हैं।

चंद्रशेखर जी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के सजग प्रहरी थे। उन्होंने सिखाया कि लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए। आज उनकी जयंती पर देश उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में याद करता है जिसने कभी अपने स्वाभिमान और देशहित से समझौता नहीं किया।


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