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सरकार पर हमला बोलने के लिए उद्योगपतियों पर क्यों साधा जाता है निशाना?

महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अडाणी मुद्दे पर केंद्र सरकार के पक्ष का समर्थन करते हुए कहा है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे की जांच के लिए एक कमेटी बैठा दी है तो जेपीसी की मांग पर जोर नहीं देना चाहिए। उनके इस बयान के तमाम राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। लेकिन अपने आपको अनुभवी नेता कहलवाने वाले पवार ने यदि यह बयान कुछ समय पहले दिया होता और विपक्षी दलों को समझाया होता तो संभवतः संसद सत्र का कीमती समय बर्बाद नहीं हुआ होता। पवार ने जेपीसी की जरूरत नहीं है, के अलावा यह भी कहा है कि एक जमाना ऐसा था जब सत्ताधारी पार्टी की आलोचना करनी होती थी तो हम टाटा-बिड़ला का नाम लेते थे। आजकल हम अंबानी-अडानी का नाम लेते हैं।
यहां सवाल शरद पवार और उन तमाम विपक्षी दलों के नेताओं से है कि क्यों सरकार पर हमला बोलने के लिए उद्योगपतियों पर निशाना साधा जाता है? राष्ट्र निर्माण में उद्योगपतियों का योगदान कम नहीं बल्कि इन हंगामा करने वाले नेताओं से ज्यादा ही है। जब देश आजाद हुआ था तब यहां सुई भी नहीं बनती थी और आज हम हर चीज बना रहे हैं। यदि हम इस काबिल बने हैं तो इसका श्रेय निजी क्षेत्र को ही सर्वाधिक जाता है क्योंकि निवेश करने का जोखिम उद्योगपतियों ने ही उठाया। हमें एक बात और समझनी होगी कि उद्योगपति यदि पैसा लगायेगा तो वह चैरिटी के लिए तो लगायेगा नहीं, मुनाफा कमाने के उद्देश्य से ही लगायेगा। लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि उसके मुनाफा कमाने के उद्देश्य से कितने लोगों को रोजगार मिलता है, कितने लोगों का घर चलता है।

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एक तरफ सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं और यदि दूसरी तरफ हम निजी क्षेत्र का रास्ता रोकने लगेंगे तो नौकरियां देगा कौन? हिंडनबर्ग कौन है, कहां से आया, उसकी रिपोर्ट का आधार क्या था, यह जाने समझे बिना सभी अडाणी के पीछे पड़ गये। इस सबसे नुकसान क्या सिर्फ अडाणी का हुआ? नुकसान तो शेयरधारकों का भी हुआ। इसके अलावा हालिया विवाद के बाद अडाणी ने कई प्रोजेक्ट्स पर काम रोक दिया है। जाहिर है इससे निवेश और रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? एक तरफ विपक्ष कहता है कि देश में बेरोजगारी बढ़ रही है और दूसरी तरफ हम कंपनियों और निवेशकों के इरादों पर पहले ही सवाल उठाते हुए उनकी राह में बाधा खड़ी करने लगते हैं जिससे रोजगार के जो अवसर पैदा होने वाले थे वह नहीं हो पाते। विपक्ष को समझना होगा कि उसके हमले टाटा बिड़ला और अडानी अंबानी तो झेल जाएंगे लेकिन विपक्ष के उद्योग विरोधी आंदोलनों से अन्य निवेशक घबराएंगे या अपने इरादे बदलेंगे। इस सबका खामियाजा आखिरकार देश की अर्थव्यवस्था को ही भुगतना होगा।

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