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मनरेगा में बदलाव के ख़तरे: कांग्रेस ने बताया ग्रामीण रोजगार पर संकट

मनरेगा में बदलाव के ख़तरे: ग्रामीण भारत, मज़दूर अधिकार और पंचायत व्यवस्था पर मंडराता संकट

 विशेष रिपोर्ट |  देश की सबसे बड़ी ग्रामीण रोज़गार योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है। कांग्रेस पार्टी ने मनरेगा में प्रस्तावित बदलावों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है और इसे ग्रामीण भारत के अस्तित्व से जुड़ा सवाल बताया है। पार्टी का कहना है कि मनरेगा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि काम करने के अधिकार का संवैधानिक विचार है, जिसे कमजोर करने का अर्थ करोड़ों गरीबों की रोज़ी-रोटी पर सीधा हमला है।

कांग्रेस के आधिकारिक पोस्टर और बयानों में साफ कहा गया है कि मनरेगा में अगर मौजूदा स्वरूप से छेड़छाड़ की गई, तो इसके परिणाम केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी होंगे।


 मनरेगा क्या है और क्यों अहम है?

मनरेगा वर्ष 2005 में लागू हुआ था, जिसका मूल उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में हर परिवार को साल में कम से कम 100 दिन का रोज़गार उपलब्ध कराना है। यह योजना बेरोज़गारी भत्ता, न्यूनतम मज़दूरी और समय पर भुगतान जैसी गारंटी के साथ आती है।

मनरेगा की सबसे बड़ी ताक़त यह रही है कि:

  • इसने ग्रामीण पलायन को रोका
  • महिलाओं को आर्थिक आत्मनिर्भरता दी
  • अनुसूचित जाति, जनजाति और वंचित वर्गों को काम का अधिकार दिया
  • पंचायतों को विकास का केंद्र बनाया

कांग्रेस का कहना है कि मनरेगा ने “रोज़गार को दया नहीं, अधिकार” बनाया।


कांग्रेस का आरोप: बदलाव नहीं, कमजोर करने की साज़िश

कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि केंद्र सरकार मनरेगा के स्वरूप में ऐसे बदलाव करना चाहती है, जिससे इसकी मौलिक आत्मा ही खत्म हो जाएगी। पार्टी के मुताबिक प्रस्तावित बदलावों से:

1. ग्रामीण बेरोज़गारी बढ़ेगी

मनरेगा ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोज़गारी से लड़ने की सबसे बड़ी ढाल है। कांग्रेस का कहना है कि अगर काम के दिनों, बजट या भुगतान प्रणाली में कटौती की गई तो गांवों में बेरोज़गारों की संख्या तेजी से बढ़ेगी।

2. न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी खत्म होगी

मनरेगा में मज़दूरी तय है और समय पर भुगतान कानूनन अनिवार्य है। कांग्रेस का आरोप है कि बदलावों से यह गारंटी कमजोर होगी और मज़दूरों को ठेकेदारी व्यवस्था के हवाले कर दिया जाएगा।

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3. मज़दूरों का शोषण बढ़ेगा

न्यूनतम मज़दूरी और काम की गारंटी हटने से निजी ठेकेदारों का दबदबा बढ़ेगा, जिससे ग्रामीण मज़दूरों का शोषण बढ़ने की आशंका है।

4. गांव से शहरों की ओर पलायन तेज़ होगा

काम न मिलने की स्थिति में ग्रामीण आबादी फिर से शहरों की ओर पलायन करेगी, जिससे:

  • शहरी झुग्गियां बढ़ेंगी
  • असंगठित श्रमिकों की संख्या बढ़ेगी
  • सामाजिक असमानता और अपराध की आशंका बढ़ेगी

5. पंचायत व्यवस्था कमजोर होगी

मनरेगा का क्रियान्वयन पंचायतों के माध्यम से होता है। कांग्रेस का कहना है कि बदलावों से पंचायतों के अधिकार सीमित होंगे और स्थानीय स्वशासन की अवधारणा को गहरी चोट पहुंचेगी


“मनरेगा बचाओ संग्राम”: राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन

कांग्रेस ने इन संभावित खतरों को देखते हुए “मनरेगा बचाओ संग्राम” के नाम से राष्ट्रीय अभियान शुरू करने की घोषणा की है। पोस्टर के अनुसार यह अभियान:

  • 10 जनवरी से 25 फरवरी 2026 तक
  •  देशभर में
  •  जनजागरण, विरोध प्रदर्शन और संगठनात्मक गतिविधियों के रूप में चलेगा

पार्टी ने नागरिकों से मिस्ड कॉल और QR कोड के माध्यम से अभियान से जुड़ने की अपील भी की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा में किसी भी तरह का बड़ा बदलाव:

  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को झटका देगा
  • सामाजिक असंतोष बढ़ा सकता है
  • राज्यों और केंद्र के बीच टकराव बढ़ा सकता है
  • चुनावी राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है

मनरेगा पहले भी कई चुनावों में निर्णायक मुद्दा रहा है, खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में।

जहां कांग्रेस और विपक्ष मनरेगा को संविधान से जुड़ा अधिकार बता रहे हैं, वहीं सरकार इसे व्यवस्था सुधार का नाम दे रही है। लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि सुधार की आड़ में योजना को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है।

मनरेगा केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की सामाजिक सुरक्षा की रीढ़ है। कांग्रेस का कहना है कि इसमें बदलाव का मतलब होगा:

  • रोज़गार से अधिकार छीनना
  • पंचायतों को कमजोर करना
  • गरीबों को फिर असुरक्षा की ओर धकेलना

आने वाले दिनों में “मनरेगा बचाओ संग्राम” किस हद तक जनआंदोलन बन पाता है, यह तय करेगा कि यह मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित रहेगा या ज़मीनी बदलाव की दिशा तय करेगा।

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