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गरियाबंद: पहाड़ी के ऊपर बसे ग्रामों में नहीं हैं हैण्डपंप, पत्थरों के सीना चीरकर ग्रामीण कर रहे हैं पानी का व्यवस्था

गरियाबंद : पहाड़ी के ऊपर बसे ग्रामों में नहीं हैं हैण्डपंप, पत्थरों के सीना चीरकर ग्रामीण कर रहे हैं पानी का व्यवस्था

उमेश प्रधान /न्यूज रिपोर्टर/गरियाबंद/मैनपुर। गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखण्ड मैनपुर क्षेत्र में ग्रामीणों के घरों तक शुद्ध पानी पहुंचाने एक तरफ शासन प्रशासन ने लाखों करोड़ों रूपये जल जीवन मिशन के तहत राशि जारी किया है लेकिन आज भी पहाड़ी के ऊपर बसे विशेष पिछड़ी कमार जनजाति ग्रामों के ग्रामीणों को एक मटका – गंजी पीने के पानी के लिए झरिया में घंटो इंतिजार करना पड़ता है। तब कही जाकर उनके प्यास बूझ पाती है यह कोई नई बात नहीं है। आजादी के पिछले 75 वर्षो से यहां निवास करने वाले ग्रामीणों के नसीब में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

मैनपुर से लगभग 24 किमी दूर ग्राम राजाडेरा है और वहां से 12 किमी पाहडी के ऊपर ग्राम ताराझर, कुर्वापानी, मटाल, भालूडिग्गी है इन ग्रामो तक पहुंचने के लिए कोई सड़क की व्यवस्था नहीं है। पैदल 8 घंटे पगडंडी पत्थरीले खाई, गड्ढो और पेड़ पौधों को पकड़कर जान जोखिम में डालकर इन ग्रामों तक पहुंचा जाता है और यह ग्राम पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के गोदग्राम कुल्हाड़ीघाट के आश्रित ग्राम है जिसकी जनसंख्या 560 के आसपास है।

भले ही सरकार इन जनजातियों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के नाम पर आजादी के बाद से अब तक अरबों रूपये खर्च हो चुके होंगे पर न तो इनके हालात बदले है और न ही नसीब लेकिन इनके विकास के नाम पर व्यवस्था व सरकारी मिश्नरी से जुड़े लोगो के नसीब व हालात जरूर बदल जाते है और इसकी चर्चा होती है। मैनपुर विकासखण्ड के दुरस्थ वनांचल पहाड़ी के ऊपर बसे ग्राम ताराझर, कुर्वापानी, मटाल, भालूपानी, डडईपानी में इन गर्मी के दिनों में लगातार पेयजल संकट गहराता जा रहा है। ग्रामीण बूंद बूंद पीने के पानी के लिए तरस रहे हैं। गांव में एक भी हेण्डपंप नहीं होने के कारण, नदी नाले सूख गए है और विशेष पिछड़ी कमार आदिवासी जनजाति के लोग पहाड़ी के ऊपर पत्थरों के सीना चीरकर बूंद बूंद पानी एकत्र कर रहे हैं तब कही जाकर एक हंडी पीने के लिए पानी बामुश्किल नसीब हो पा रही है। वह भी गांव से लगभग 02 किमी दूर पैदल चलने के बाद पाहडी के ऊपर नदी नाले झरिया पोखर सब सुख जाने के कारण ग्रामीणों के द्वारा खोदे गए झरिया के आसपास वन्यप्राणीयों का डर बना रहता है क्योंकि वन्यप्राणी भी इसी झरिया में प्यास बुझाने पहुंचते हैं इसलिए ग्रामीण महिलाऐ समूह में झरिया पानी लेने जाते हैं और साथ में सुरक्षा की दृष्टि से पुरुष भी उनके साथ रहते हैं और वन्यप्राणियों से अपनी सुरक्षा के लिए पारंपरिक हथियार तीर धनुष लेकर जाते है क्योंकि वन्यप्राणीयों का डर बना रहता है।
8 घंटे पैदल पगडंडी पहाड़ी रास्ते में चलने के बाद पहुंचा जाता है इन ग्रामों में

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गर्मी के दिनों में मवेशियों को अपने रिश्तेदारों के यहां पहाड़ी के नीचे गांव में ले आते हैं
इन ग्रामों के लोग पानी की कमी के चलते अपनी पालतू मवेशियों को अपने रिश्तेदारों या अपने परिचितों के यहां पाहडी के नीचे ओड़िशा और कुल्हाड़ीघाट के आसपास के गांव में छोड दिऐ है जो गर्मी बीतने के बाद बारिश के दिनों में वापस अपने मवेशियों को घर ले जाऐगे क्योकि गांव में ग्रामीणों को बमुश्किल पीने के पानी नसीब हो रहा है मवेशियों को कहा से मिलेगा।
पीएचई विभाग द्वारा हर वर्ष सर्वे और टेंडर की बात कही जाती है

कुल्हाडीघाट के सरपंच श्रीमति धनमोती बाई ने बताया कुल्हाडीघाट के आश्रित ग्राम ताराझर, मटाल, कूर्वापानी, भालूडिग्गी, डडईपानी जो पहाडी के उपर बसा हुआ है। यहां इस गर्मी मे पेयजल की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है लोगो को झरिया खोदकर बूंद बूंद पानी के लिए मशक्कत करना पड रहा है।
क्या कहते हैं पीएचई के अधिकारी गरियाबंद पीएचई विभाग एसडीओ बी एस यादव ने बताया कुल्हाडीघाट के आश्रित ग्राम जो पाहडी के ऊपर बसा है जो भालूडिग्गी,मटाल,ताराझर, कुर्वापानी में पीएचई विभाग द्वारा पेयजल उपलब्ध कराने पूरा प्रयास किया जा रहा है। विभाग का अमला इन गांवों में पहुंचकर पूरा सर्वे कर स्टिमेट तैयार किया गया है। यहां डगबोर,हाथबोर से भी हैंडपंप खनन कर ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराई जाएगी। इसके लिए टेंडर प्रक्रिया जारी है।

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