शीशल कला की अलख जगा रहीं शोभा बघेल: हुनर से समृद्धि की नई मिसाल

शीशल कला की अलख जगा रहीं शोभा बघेल: हुनर से समृद्धि की नई मिसाल

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जगदलपुर, 11 मार्च 2025 – बस्तर की समृद्ध शिल्प परंपरा में कई हस्तशिल्प अपनी विशिष्टता के लिए जाने जाते हैं, जिनमें काष्ठ कला, टेराकोटा, बेलमेटल, लौह शिल्प जैसे हस्तशिल्प विशेष स्थान रखते हैं। इन्हीं में से एक है शीशल कला, जिसे परचनपाल निवासी शोभा बघेल एक नई पहचान दिलाने में जुटी हुई हैं। अपने आत्मनिर्भरता के प्रयासों से उन्होंने न केवल स्वयं को सशक्त किया है, बल्कि कई महिलाओं और युवाओं को भी इस हुनर से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बना रही हैं।

बचपन से कला के प्रति लगाव

बस्तर जिले के विकासखण्ड बस्तर के परचनपाल गांव में जन्मी शोभा बघेल का बचपन से ही कला के प्रति गहरा रुझान था। परंपरागत रूप से उनके परिवार में शिल्पकारी का कार्य होता था, जिससे प्रेरित होकर उन्होंने शीशल रस्सी से कलात्मक वस्तुएं बनाना सीखा। प्रारंभ में यह केवल एक शौक था, लेकिन समय के साथ उन्होंने इसे अपने रोजगार का जरिया बना लिया।

शीशल कला से बनी आत्मनिर्भरता की मिसाल

शोभा बघेल शीशल रस्सी से डायनिंग मेट, पी-कोस्टर, नाव, झूमर, गुड़िया, बास्केट, साइड पर्स, झूला, दीवार इंजन, लेटर होल्डर आदि कलात्मक वस्तुएं तैयार कर रही हैं। इन उत्पादों को स्थानीय बाजारों के अलावा शबरी एम्पोरियम, बिहान मड़ई, शिल्प महोत्सव, बस्तर मड़ई, चित्रकोट महोत्सव, आमचो बस्तर बाजार और राज्य के आधुनिक मॉलों में विक्रय कर हर महीने 20 से 25 हजार रुपए तक की आय अर्जित कर रही हैं। इसके अलावा, वे विभिन्न प्रदेशों में आयोजित सरस मेला और प्रदर्शनी में भी अपने उत्पादों की बिक्री कर रही हैं।

घर-परिवार को भी किया सशक्त

अपने हुनर की बदौलत शोभा बघेल ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया बल्कि अपने परिवार को भी सशक्त बनाया। उनके बेटे भगतसिंह बघेल ने स्नातक की शिक्षा पूरी की है, जबकि उनकी बेटी पिंकी बघेल बीएससी नर्सिंग कर चुकी हैं और वर्तमान में जगदलपुर के एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में कार्यरत हैं। पिंकी भी अपनी आय से घर की आर्थिक मदद कर रही हैं।

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प्रशिक्षण के माध्यम से हुनर का विस्तार

शोभा बघेल अपने पति बंशी बघेल के साथ मिलकर शीशल कला का प्रशिक्षण भी दे रही हैं। उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) से जुड़ी महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ ही केंद्रीय विद्यालय जगदलपुर और नवोदय विद्यालय जगदलपुर के छात्र-छात्राओं को भी इस कला में प्रशिक्षित किया है। वर्तमान में वे ओडिशा राज्य के बलांगीर जिले के नवोदय विद्यालय बेलपाड़ा में शीशल कला का प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं।

बिहान योजना से मिली नई दिशा

वर्ष 2016 में शोभा बघेल ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत गठित स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपनी आजीविका को नई दिशा दी। इस योजना के माध्यम से उन्हें न केवल कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित हुई, बल्कि उनके तैयार उत्पादों को उचित दाम भी मिलने लगा। इससे समूह से जुड़ी महिलाओं के जीवन में भी खुशहाली आई है। इस योजना के अंतर्गत उन्हें रिवॉल्विंग फंड, सामुदायिक निवेश कोष एवं बैंक लिंकेज के माध्यम से दो लाख रुपए से अधिक की सहायता उपलब्ध कराई गई है, जिससे वे अपने उत्पादों को बड़े बाजारों तक पहुंचाने में सफल रही हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने का सपना

शोभा बघेल का सपना है कि शीशल कला को देश-विदेश तक पहुंचाया जाए, जिससे बस्तर की यह अनूठी कला एक नई पहचान बना सके। वे विभिन्न संस्थानों के माध्यम से इस कला को और अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में वे अपने हस्तशिल्प उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री भी शुरू करने की योजना बना रही हैं, जिससे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक उनकी पहुंच हो सके।

शोभा बघेल की यह यात्रा न केवल उनके आत्मनिर्भर बनने की कहानी है, बल्कि यह अन्य महिलाओं और युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। बस्तर की पारंपरिक हस्तशिल्प कलाओं को आधुनिक बाजारों तक पहुंचाने की दिशा में उनका योगदान महत्वपूर्ण है। उनके प्रयासों से न केवल स्थानीय शिल्पकारों को नई संभावनाएं मिल रही हैं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत भी समृद्ध हो रही है।