तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में खेला कर दिया

 

बंगाली रसगुल्लों की चाशनी एक बार कपड़ों पर गिर जाए तो बहुत मुश्किल से छूटती है। बंगाली मानस ने एक बार फिर यही साबित किया है। रुझानों से ही साफ हो गया है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में खेला कर दिया है। हालांकि, नंदीग्राम में शुरुआती तौर पर ममता का पिछडऩा खीर में नमक जैसा है।

बंगाल ने 1950 से लगातार 17 सालों तक कांग्रेस को सत्ता सौंपी, लेकिन जब राज्य को सियासी उठापटक का सामना करना पड़ा तो 1977 में उसने वामदलों को चुन लिया। इसके बाद बंगाल ने लेफ्ट को एक या दो नहीं, पूरे सात विधानसभा चुनाव जिताए। लेफ्ट ने ज्योति दा की अगुआई में भारी बहुमत के साथ पूरे 34 साल राज

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लेफ्ट का दौर खत्म हुआ तो ममता की तृणमूल को सत्ता मिली और वे पिछले दस साल से आरामदायक बहुमत के साथ बंगाल पर राज कर रही हैं। इस बार फिर वे भारी बहुमत के साथ लौट रही हैं।
1. खुद को बंगाली प्राइड से जोडऩे में सफल रहीं दीदी
बंगाल चुनाव में भाजपा ममता सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण, घुसपैठ को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगा रही थी। इनके जरिए भाजपा ध्रुवीकरण की कोशिश में थी। काफी हद तक बीजेपी इसमें सफल भी दिखी, लेकिन इसके मुकाबले ममता बंगाली गौरव और संस्कृति की बात बार-बार कर रही थीं। उनकी चुनावी रणनीति यह थी कि वे बंगाल के लोगों को समझा रही थीं कि अगर वे चुनाव हारीं तो बंगाल के बाहर के लोग राज्य को चलाएंगे। हिंदी भाषी बहुल और उत्तर बंगाल में यह भले ही कम चला हो, लेकिन दक्षिण बंगाल और ग्रामीण इलाकों में यह मुद्दा चला और इसके सहारे ममता ने बढ़त बनाई।
2. ममता अब मोदी विरोधी विपक्ष का राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व कर शाह की जोड़ी का ममता शुरू से ही विरोध करती रही हैं और विपक्ष को उन्होंने कई बार एक मंच पर लाने की कोशिश भी की। हालांकि, अभी तक यह कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी, लेकिन बंगाल के इस बेहद तनावपूर्ण चुनाव में जीत के बाद ममता दावा कर सकती हैं कि मोदी का राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला वही कर सकती हैं।

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3. भाजपा को क्षेत्रीय पार्टियां ही रोक सकती हैं, कांग्रेस की स्थिति और कमजोर होगी
बंगाल में ममता की जीत इस थ्योरी पर फिर मुहर लगा रही है कि भाजपा उन राज्यों में आसानी से जीत हासिल कर लेती है, जहां उसका मुकाबला कांग्रेस से होता है। हालांकि यूपी इसका अपवाद रहा है। बंगाल के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने खुद पूरी ताकत लगा दी, लेकिन ममता अपना किला बचाने में सफल हो गईं। इसके बाद यह मांग भी जोर पकड़ सकती है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विरोध का नेतृत्व करने के लिए पूरे विपक्ष को साथ आना चाहिए। लेकिन, उसकी लीडरशिप स्थानीय स्तर पर हो। इसका मतलब यह होगा कि कांग्रेस कई और राज्यों में सैकेंड पार्टनर बन जाएगी।
4. ममता अब बंगाल में ज्योति बसु जैसी कल्ट फेस बन चुकी हैं
बंगाल चुनाव इस मायने में महत्वपूर्ण है कि यहां एक तरफ भाजपा की विशाल, साधन-संपन्न चुनाव मशीनरी थी। जबकि दूसरी तरफ अकेली ममता जिनके पास स्ट्रीट फाइटर वाली छवि थी। भाजपा के पास पूरे देश के नेताओं का जमावड़ा था, लेकिन तृणमूल सिर्फ ममता की लोकप्रियता के सहारे थी।
दस साल सत्ता चलाने के बाद ममता की जीत यह भी इशारा करती है कि बंगाल में उनके स्तर की लोकप्रियता किसी के पास नहीं हैं और बंगाल के भद्र लोक में ममता की छवि वैसी ही हो चुकी है जैसी एक जमाने में ज्योति बसु की थी। मोदी बंगाल की जनता में भी लोकप्रिय हैं, लेकिन यह लोकप्रियता लोकसभा में काम करती है। राज्य की राजनीति की बात आने पर ममता का कोई मुकाबला नहीं है।
5. कोरोना को लेकर मोदी सरकार की आलोचना बढ़ेगी
कोरोना के बीच चुनावी रैलियों और फिर बढ़ते केसों को लेकर आलोचना झेल रही मोदी सरकार पर विपक्ष और हमलावर हो जाएगा। वैक्सीनेशन को लेकर विपक्ष शासित राज्यों और केंद्र के बीच रस्साकशी पहले से ही चल रही है। 18 साल से ज्यादा उम्र के लोगों का वैक्सीनेशन शुरु होने के बाद यह टकराव और बढ़ेगा। वैक्सीन का प्रोडक्शन कम है और लगवाने वालों की संख्या ज्यादा। ऐसे में राज्य हर अव्यवस्था का ठीकरा केंद्र पर फोड़ा जाएगा और भाजपा सरकार पर दबाव बढ़ेगा।
6. भाजपा की 2024 की तैयारी को झटका लगेगा
जानकारों के मुताबिक, भाजपा ने अभी से 2024 के  लिए तैयारी शुरू कर दी थी लेकिन बंगाल के परिणाम ने रणनीति पर सोंचने मजबूर कर दिया है। यूपी व उत्तराखंड पर भी अब नजर रखनी होगी।