छत्तीसगढ़राज्यरायपुर

सुरता//रतिहा के वो ‘किसबीन नाचा'(छत्तीसगढ़ी स्थानीय भाषा में)

सुरता//रतिहा के वो ‘किसबीन नाचा’
हमर इहाँ के संस्कृति के मूल स्वरूप ल आने-आने क्षेत्र अउ राज ले लाने गे ग्रंथ अउ संस्कृति संग घालमेल कर के कइसे बदल दिए गे हे, एकर उदाहरण खातिर “किसबीन नाचा” के कारण ल जानना अउ समझना बहुत जरूरी हे.
मोर जनम भाठापारा शहर म होए हे. उहाँ हमन हथनीपारा म राहत रेहेन. सिरिफ चौथी कक्षा के शिक्षा तक ही उहाँ रहि पाएंव. फेर उहाँ हर बछर होली बखत कोनो छुट्टी के दिन राहय, तेकर आगू रतिहा रात भर किसबीन नाचा चलय. तेमा बिहान भर के छुट्टी म लोगन घर म रहि के आराम कर सकंय. ए बात के सुरता मोला आजो ले हे.
चौथी ले आगू के पढ़ई खातिर मैं अपन पैतृक गाँव नगरगांव आएंव, त इहों होली बखत ‘किसबीन नाचा’ के परंपरा ल देखेंव. हमर गाँव म तो कुछ जादच होवय. प्रतियोगिता करे बरोबर. एक पारा के मन अतका पइसा दे के नचाए बर लाने हे, त हमन जादा पइसा वाली ल लानबो.
तब ए किसबीन नाचा ल काबर करे जाथे? ए बात ल नइ समझत रेहेन. अपन मूल संस्कृति के ज्ञान के अभाव म तब लोगन एला गलत नजरिया ले घलो देखयं अउ समझयं. छत्तीसगढ़ राज्य के स्वपनदृष्टा डॉ. खूबचंद बघेल जी एकरे सेती ए परंपरा के घोर विरोध करंय. डॉ. खूबचंद बघेल अउ हमर गाँव के खार एके म जुड़े हे. सियान मन बतावंय, ए परंपरा ल खतम करे खातिर डॉक्टर साहब लोगन ल इहाँ तक कहि देवत रिहिन हें- तुमन ल होले डांड़ म परी नचवाए के अतेक सउंखे हे, त मोर डाक्टरीन (अपन धर्मपत्नी) ल लेग जावव नचवाए बर, फेर ए किसबीन नचाए के परंपरा ल बंद करव भई.
ए बात तो हे. वो बखत महिला कलाकार मन कोनो भी सार्वजनिक जगा म अपन कला के प्रदर्शन नइ करत रिहिन हें. तब शायद उनला आज के जइसे सम्मान के नजर ले नइ देखे जावत रिहिसे. एकरे सेती वो बखत के नाचा, नाटक या लीला आदि म पुरुष मन ही महिला पात्र के भूमिका ल निभावंय.
महूं तब किसबीन नाचा के मूल कारण ल नइ जान पाए रेहेंव. काबर के किसबीन नाचा के होली परब के जेन प्रचारित रूप हे, तेकर संग तो कोनो संबंध नइए. त फेर ए नाचा के कारण का हे?
होली के संबंध म तो तब हमन अतके सुनन अउ पढ़न न के भक्त प्रहलाद ल अपन कोरा म बइठार के वोकर फूफू होलिका ह चीता म बइठ गे रिहिसे, फेर भगवान के कृपा ले प्रहलाद तो बांचगे अउ होलिका खुदे वो चीता म बर के स्वाहा होगे. त फेर ए प्रसंग म किसबीन नाचा के का संबंध हे?
साहित्य अउ पत्रकारिता ले जुड़े रेहे के सेती महूं कोनो कोनो विषय ऊपर तुतारी लेके भीड़ जावत रेहेंव. फेर वोकर कारण नइ समझ आइस. आगू चलके जब मैं साधना के रद्दा म आएंव, अउ कुछ अइसे संयोग जमे लगिस जब इहाँ के संस्कृति के मूल (वास्तविक) स्वरूप के ज्ञान मिले लगिस, तब समझेंव के छत्तीसगढ़ म जेन होली मनाए जाथे, वोला होलिका दहन के सेती नहीं, भलुक कामदहन के सेती मनाए जाथे. एकरे सेती ए परब ल वसंतोत्सव या मदनोत्सव घलो कहे जाथे.
हमन कथा सुने हावन न, शिव पुत्र के हाथ म मरे के वरदान पाए के बाद असुर ताड़कासुर भारी अत्याचार करे लागिस. काबर के वो अपनआप ल अमर होगेंव समझे बर धर लिए रिहिसे. काबर ते, शिव जी तो सती आत्मदाह के बाद घोर तपस्या म बिधुन होगे रिहिन हें. त फेर कहाँ ले उंकर लइका आतीस, अउ कइसे ताड़कासुर के अंत होतीस?
देवता मन चारों मुड़ा ले चिथियागे रिहिन हें. तब सब सुन्ता होके कामदेव ल शिव तपस्या भंग करे खातिर भेजिन. तब कामदेव अपन सुवारी रति संग जाके शिव तपस्या भंग करे के उदिम करे लागिस.
एकर खातिर वो ह वसंत के मादकता भरे मौसम के चयन करे रिहिसे. एकरे सेती हमन बसंत पंचमी के दिन होले डांड़ म जेन अंडा (अरंडी) के पौधा गड़ियाथन न तेन उही कामदेव के आए के प्रतीक स्वरूप आय. तहाँ ले वोकरे संग वासनात्मक गीत, नृत्य अउ दृश्य के चलन होथे, तेन सब वोकरे कारण आय. तेमा शिव जी के अंदर काम के उदय होवय, अउ वो ह पार्वती संग बिहाव कर लेवय, तेमा शिव पुत्र के हाथ ले मरे के वरदान पाये आततायी के संहार खातिर शिव पुत्र के जनम हो सकय.
ए सब प्रसंग ल समझे के बाद मोला किसबीन नाचा के मूल कारण समझ म आइस, के ए ह उही कामदेव के सुवारी रति के नृत्य के प्रतीक स्वरूप आयोजन करे जाने वाला आयोजन आय.
ए सब समझे के बाद मन म गौरवबोध होइस के हम कतेक गौरवशाली संस्कृति ल इहाँ जीयत हावन. संग म इहू समझ म आइस के ए परब ल बसंत पंचमी ले लेके फागुन पुन्नी तक लगभग चालीस दिन के एकरे सेती मनाए जाथे, काबर के कामदेव अउ रति अतके दिन तक शिव तपस्या भंग करे खातिर लगातार प्रयास करत रिहिन हें. आप खुदे सोचव, होलिका तो सिरिफ एके दिन म चीता रचिस, वोमा आगी ढिलवा के प्रहलाद ल अपन गोदी म धर के बइठिस, अउ खुदे भसम होगे, त फेर वोकर बर चालीस दिन के परब काबर???
मैं छत्तीसगढ़ के मूल संस्कृति ल इहाँ के लोक परंपरा के आधार म नवा सिरा ले लिखे के बात हमेशा करथौं, तेकर इही सब कारण आय. फेर ए दुखद बात आय, के इहाँ के बुद्धिजीवी वर्ग आज घलो आने प्रदेश ले लाने गे ग्रंथ मन के आधार म गोठ करइया मन के ही पाछू किंजरे के ही बुता करत हें.
-सुशील भोले/संजय नगर, रायपुर/मो/व्हा. 9826992811

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