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भरत मुनि स्मृति दिवस पर भव्य आयोजन, कला और संस्कृति की अनूठी प्रस्तुति

भरत मुनि स्मृति दिवस पर भव्य आयोजन, कला और संस्कृति की अनूठी प्रस्तुति

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अंबिकापुर, सरगुजा: संस्कार भारती जिला सरगुजा इकाई के तत्वावधान में विश्वविद्यालय इंजीनियरिंग कॉलेज, डिगमा में भरत मुनि स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संस्कार भारती के अध्यक्ष आदरणीय रंजीत सारथी, प्रदेश संयोजक आनंद सिंह यादव, कार्यकारी अध्यक्ष विजय सिंह दमाली, महामंत्री अर्चना पाठक, डॉ. विजय कुमार द्विवेदी (प्रोग्राम ऑफिसर, एनएसएस), महीधर दुबे (नोडल ऑफिसर, आरआरसी), डिगमा के सरपंच सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ और ग्रामीणजन उपस्थित रहे। इस आयोजन ने भारतीय नाट्यकला की प्राचीन परंपरा और उसकी महत्ता को पुनः उजागर किया।

संस्कार भारती का उद्देश्य और योगदान

संस्कार भारती, जो भारतीय कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित संस्था है, ने इस आयोजन के माध्यम से युवा पीढ़ी को भारतीय नाट्यशास्त्र और उसके मूल सिद्धांतों से अवगत कराने का प्रयास किया। इस प्रकार के आयोजन छात्रों में सांस्कृतिक चेतना जागृत करने के साथ-साथ उनकी प्रतिभा को मंच प्रदान करने का कार्य करते हैं।

कार्यक्रम की प्रमुख झलकियाँ

भरत मुनि के जीवन और नाट्यशास्त्र पर व्याख्यान: महामंत्री अर्चना पाठक ने भरत मुनि के नाट्यशास्त्र और उनके जीवनवृत्त पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार नाट्यशास्त्र भारतीय रंगमंच की आधारशिला है और इसकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक बनी हुई हैं।

नृत्य, नाटक एवं संगीत प्रस्तुतियाँ: विद्यार्थियों ने भरत मुनि की शिक्षाओं पर आधारित नृत्य, नाटक और संगीत की मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं, जिससे दर्शक भाव-विभोर हो उठे।

विद्यार्थियों एवं शिक्षकों का सम्मान: कार्यक्रम में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले प्रमुख नाम इस प्रकार हैं:

विद्यार्थी: भूपेंद्र देवांगन, विकास कुमार डनसेना, मुकेश चंद्रा, संजय निषाद, राधेश्याम, प्रिया, हिमांशु, वंदना, सोनल साहू, विशाल जीत प्रकाश, तरुण साहू, प्रसनजीत बनिक, अमृता सिंह, अभ्यास गुप्ता, रिया राय, नितिन आदि।

शिक्षकगण: (यदि कोई शिक्षकों के नाम हैं तो उन्हें जोड़ा जा सकता है)।

भरत मुनि: भारतीय नाट्यशास्त्र के जनक

भरत मुनि भारतीय नाट्यशास्त्र के जनक माने जाते हैं। उन्होंने “नाट्यशास्त्र” नामक ग्रंथ की रचना की, जो नाटक, संगीत, नृत्य और अभिनय के सभी तकनीकी पहलुओं का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है। उनका काल 400 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के बीच माना जाता है।

रस सिद्धांत की स्थापना

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भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में रस सिद्धांत की स्थापना की, जिसमें प्रसिद्ध सूत्र “विभावानुभाव संचारीभाव संयोगद्रस निष्पति:” दिया गया। इस सिद्धांत के अनुसार, नाटक या अन्य किसी कलात्मक अभिव्यक्ति में रस की उत्पत्ति विभिन्न भावों के संयोजन से होती है। यह सिद्धांत आज भी भारतीय रंगमंच, साहित्य और सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

नाट्यशास्त्र का महत्व

नाट्यशास्त्र न केवल रंगमंच के लिए बल्कि संपूर्ण साहित्य और कला जगत के लिए एक आधारभूत ग्रंथ है। इसमें नाट्यकला, संगीत, छंद, अलंकार और रस के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह ग्रंथ अभिनय की कला को एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है और आज भी नाट्यकला के विद्यार्थियों के लिए अमूल्य स्रोत बना हुआ है।

प्रथम नाटक और ऐतिहासिक प्रस्तुति

ऐसा कहा जाता है कि भरत मुनि द्वारा रचित प्रथम नाटक “देवासुर संग्राम” था, जिसका मंचन इन्द्र की सभा में हुआ था। यह नाटक देवताओं और असुरों के मध्य हुए संघर्ष और देवों की विजय पर आधारित था। इस नाटक की प्रस्तुति ने नाट्यकला की नींव रखी और भारतीय रंगमंच को एक नई दिशा प्रदान की।

आधुनिक रंगमंच और नाट्यशास्त्र की प्रासंगिकता

आज के दौर में भी भरत मुनि का नाट्यशास्त्र अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है। भारतीय रंगमंच, सिनेमा और टेलीविजन में आज भी उनके सिद्धांतों का अनुसरण किया जाता है।

फिल्म और रंगमंच: अभिनय, नृत्य और संगीत में भावों की प्रस्तुति में रस सिद्धांत का पालन किया जाता है।

शिक्षा और अनुसंधान: विश्वविद्यालयों में नाट्यशास्त्र पर शोध किए जाते हैं और इसे कला की शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।

सांस्कृतिक पुनरुत्थान: संस्कार भारती जैसी संस्थाएँ भरत मुनि की परंपराओं को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

संस्कार भारती के प्रयास और भविष्य की योजनाएँ

संस्कार भारती सरगुजा इकाई ने इस कार्यक्रम के माध्यम से युवा पीढ़ी में भारतीय नाट्यकला के प्रति रुचि उत्पन्न करने का कार्य किया। संस्था भविष्य में भी इसी प्रकार के सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक आयोजनों के माध्यम से भारतीय कला और संस्कृति के संवर्धन के लिए कार्य करती रहेगी।

कार्यक्रम के अंत में महीधर दुबे (नोडल ऑफिसर, आरआरसी, विश्वविद्यालय इंजीनियरिंग कॉलेज, अंबिकापुर) द्वारा आभार ज्ञापित किया गया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन भारतीय कला और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने सभी प्रतिभागियों, आयोजकों और दर्शकों का धन्यवाद किया और भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प व्यक्त किया।

भरत मुनि स्मृति दिवस पर आयोजित यह भव्य कार्यक्रम भारतीय नाट्यकला की महत्ता को पुनः स्थापित करने में सफल रहा। विद्यार्थियों, शिक्षकों और आम नागरिकों ने इसमें उत्साहपूर्वक भाग लिया और भारतीय कला परंपरा की समृद्धि को आत्मसात किया। संस्कार भारती का यह प्रयास निश्चित रूप से कला और संस्कृति के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान सिद्ध होगा।

Ashish Sinha

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