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पलायन रोको, नौकरी दो यात्रा: बिहार की राजनीति में नया मोड़ या चुनावी रणनीति?

पलायन रोको, नौकरी दो यात्रा: बिहार की राजनीति में नया मोड़ या चुनावी रणनीति?

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दरभंगा से उठी युवाओं की आवाज

बिहार की राजनीति में इन दिनों पलायन रोको, नौकरी दो यात्रा चर्चा का विषय बनी हुई है। इस यात्रा के नेतृत्वकर्ता कन्हैया कुमार बेरोजगारी, शिक्षा, खेल और पलायन जैसे अहम मुद्दों को उठाते हुए दरभंगा पहुंचे। यात्रा के दौरान युवाओं और छात्रों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि राज्य के नौजवान रोजगार और शिक्षा को लेकर सरकार से जवाब मांगने के मूड में हैं।

बेरोजगारी और पलायन: बिहार की सबसे बड़ी चुनौतियाँ

बिहार लंबे समय से पलायन और बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है। राज्य में नौकरियों की कमी, उद्योगों का अभाव और सरकारी भर्तियों में देरी जैसी समस्याएं युवाओं को रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों की ओर जाने पर मजबूर कर रही हैं।

बिहार से हर साल लाखों युवा दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और दक्षिण भारत के शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

राज्य में शिक्षकों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा, जिससे शिक्षा व्यवस्था चरमराने लगी है।

2008 से लेकर अब तक LNMU में लाइब्रेरियन की भर्ती नहीं हुई है।

खेल कोटे से सरकारी नौकरी देने की नीति समाप्त कर दी गई, जिससे खिलाड़ियों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।

डोमिसाइल नीति लागू न होने के कारण दिव्यांग उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में मुश्किल हो रही है।

पोलो ग्राउंड में होने वाले अलग-अलग कार्यक्रमों के चलते सेना की तैयारी करने वाले युवाओं को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

युवाओं के भविष्य पर सियासी तकरार

कन्हैया कुमार का कहना है कि बिहार की मौजूदा सरकार और केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार पिछले 10-11 सालों से देश का ध्यान असल मुद्दों से भटकाने की साजिश कर रही है। बेरोजगारी, शिक्षा और नौकरियों से जुड़े सवालों को दरकिनार कर समाज में विवाद पैदा किए जा रहे हैं।

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AICC मीडिया एवं पब्लिसिटी विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने भी इस यात्रा के समर्थन में कहा कि यह मुद्दे आज नहीं तो कल सभी राजनीतिक दलों को उठाने ही पड़ेंगे। उन्होंने कहा, “बिहार ने पूरे देश को दिशा दी है, लेकिन आज बिहार का नौजवान संघर्ष कर रहा है, यह उसके साथ अन्याय है।”

बिहार सरकार की नीतियों पर सवाल

बिहार सरकार की नीतियों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में कुछ नई योजनाएँ जरूर लागू की गई हैं, लेकिन वे ज़मीनी स्तर पर प्रभावी नहीं दिख रही हैं।

‘मुख्यमंत्री उद्यमी योजना’ के तहत युवा उद्यमियों को सहायता देने की बात कही गई थी, लेकिन इसके आवेदन और स्वीकृति की प्रक्रिया में काफी जटिलता है।

बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना के तहत छात्रों को लोन दिया जाता है, लेकिन अधिकांश बैंक इसके लिए इच्छुक नहीं होते।

राज्य में नए उद्योग स्थापित करने को लेकर सरकार की उदासीनता बनी हुई है।

स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश की कमी के कारण राज्य की युवा पीढ़ी बाहर जाने के लिए मजबूर हो रही है।

यात्रा का असर और राजनीतिक समीकरण

इस यात्रा का राजनीतिक असर आगामी लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और महागठबंधन इस यात्रा को समर्थन देते नजर आ रहे हैं। बिहार के युवा मतदाताओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी।

क्या ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा चुनावी रणनीति का हिस्सा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा सिर्फ सामाजिक आंदोलन नहीं बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीति का भी हिस्सा हो सकती है। कांग्रेस इस यात्रा के जरिए युवा मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। हालांकि, इसके असर का मूल्यांकन चुनाव के नतीजों के बाद ही किया जा सकेगा।

बिहार की राजनीति में बेरोजगारी और पलायन हमेशा से महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं, लेकिन इन्हें राजनीतिक दलों ने प्राथमिकता से नहीं लिया। पलायन रोको, नौकरी दो यात्रा इस दिशा में एक नई पहल है, जिसने राज्य के युवाओं का ध्यान आकर्षित किया है। अब देखना होगा कि यह यात्रा बिहार के भविष्य की राजनीति को किस हद तक प्रभावित करती है।

Ashish Sinha

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